1. प्रस्तावना: लंदन की एक शाम और विशाखापत्तनम की वो लड़की 📚
बीती शरद ऋतु में लंदन के केंद्र में एक साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान मेरी मुलाकात विशाखापत्तनम की एक युवती से हुई। वह अपनी उम्र के शुरुआती 20वें पड़ाव पर थी, सुशिक्षित और आधुनिक। बातचीत के दौरान जब हम भारत में घटती पठन-संस्कृति पर चर्चा करने लगे, तो उसने बड़ी सहजता से स्वीकार किया कि आज के युवाओं में पढ़ने की आदतें वैसी गहरी नहीं रही हैं। लेकिन जब मैंने उससे उसकी मातृभाषा—तेलुगु—की उसकी पसंदीदा किताबों के बारे में पूछा, तो उसने जो जवाब दिया, उसने मुझे न केवल चौंकाया बल्कि एक गहरे सोच में डाल दिया।
उसने कहा, “मैंने अपनी भाषा में कभी कुछ नहीं पढ़ा।” यह सुनकर मैं रुक गया, पर उसकी अगली बात और भी भयावह थी: “सच कहूँ तो, मैं इसे बड़ी मुश्किल से पढ़ पाती हूँ और लिख तो बिल्कुल नहीं सकती।” विडंबना देखिए, उसकी माँ तेलुगु साहित्य की अनन्य प्रशंसक हैं, लेकिन वह अपनी बेटी को अपनी ही वर्णमाला के ‘అ ఆ ఇ ई’ तक नहीं सिखा सकीं।
यह दृश्य विद्रूप (risible) है। कल्पना कीजिए कि लंदन के वॉक्सहॉल (Vauxhall) में पली-बढ़ी कोई महिला गर्व से कहे कि वह ‘A to Z’ नहीं पढ़ सकती—दुनिया उसे उपहास की दृष्टि से देखेगी। लेकिन विशाखापत्तनम की एक लड़की के लिए अपनी मातृभाषा में ‘अनपढ़’ होना आज एक सामान्य बात बन गई है, शायद एक ‘स्टेटस सिंबल’ भी। क्या अंग्रेजी की इस अंधी दौड़ में हमने अपनी ही जुबान में खुद को निरक्षर बना लिया है?
2. भाषाई पदानुक्रम: एक शून्य-योग खेल (Zero-Sum Game) ⚖️
भारत में हमने अंग्रेजी को केवल एक संपर्क भाषा (link language) नहीं माना, बल्कि उसे सामाजिक श्रेष्ठता के ऊंचे पायदान पर बैठा दिया है। यहाँ समस्या अंग्रेजी सीखने में नहीं है, बल्कि उस मानसिकता में है जिसे मैं ‘भाषाई शून्य-योग खेल’ (Zero-sum game) कहता हूँ। हमने अनजाने में यह मान लिया है कि यदि हमें अंग्रेजी में ‘ऊंचा’ उठना है, तो अपनी मातृभाषा को ‘नीचा’ दिखाना ही होगा।
“भारतीय मानस में एक गहरा भाषाई पदानुक्रम (hierarchy) घर कर गया है। हम अंग्रेजी को जितना अधिक श्रेष्ठ और आधुनिक मानते हैं, अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को उतना ही ‘स्थानीय’ (local) और पिछड़ा हुआ समझने लगते हैं। यह आत्म-विस्मृति का चरम है।”
आज के ‘जेन-जी’ (Gen Z) युवाओं के बीच यह एक फैशन बन गया है कि वे बड़े गर्व से अपनी भाषाई अक्षमता का ढिंढोरा पीटते हैं। “ओह, मेरे घर में तो सिर्फ अंग्रेजी बोली जाती थी, इसलिए मेरी तेलुगु/कन्नड़ या पंजाबी उतनी अच्छी नहीं है,” यह जुमला आज की कुलीनता का नया पैमाना है। समाज ने यह स्वीकार कर लिया है कि आपकी अंग्रेजी जितनी परिष्कृत होगी, आपको अपनी मातृभाषा में उतना ही ‘गंवार’ होने की छूट मिल जाएगी।
3. जनरेशन एक्स (Gen X) की भूमिका: क्या माता-पिता ने ही बोए थे ये बीज? 👨👩👧👦
एक स्तंभकार के रूप में जब मैं इस भाषाई पतन की जड़ों को खोजता हूँ, तो मेरा ध्यान 1965 और 1980 के बीच जन्मे ‘जनरेशन एक्स’ (Gen X) के माता-पिता पर जाकर टिकता है। यह वह पीढ़ी थी जो स्वतंत्र भारत के आधुनिक होने के संक्रमण काल में बड़ी हुई। उन्होंने अंग्रेजी को ‘सफलता की एकमात्र कुंजी’ और ‘वैश्विक नागरिक’ बनने के एकमात्र माध्यम के रूप में देखा।
इन माता-पिता ने अपने बच्चों को एक ‘बेहतर भविष्य’ देने के नाम पर अनजाने में उनकी सांस्कृतिक नींव ही हिला दी। उन्होंने घर के भोजन की मेज पर भी अंग्रेजी को अनिवार्य कर दिया। उनके लिए अंग्रेजी बोलना केवल संवाद नहीं, बल्कि एक प्रकार का ‘सांस्कृतिक प्रक्षालन’ (cultural cleansing) था। उन्होंने बच्चों को अंग्रेजी कार्टून देखने और पश्चिमी साहित्य पढ़ने के लिए तो प्रेरित किया, लेकिन स्थानीय लोककथाओं और भाषाई बारीकियों को ‘पुराने जमाने की चीज’ मानकर दरकिनार कर दिया। परिणाम? एक ऐसी पीढ़ी तैयार हुई जो अपनी ही खाल में असहज (uncomfortable in their own skin) है।
4. गर्व और शर्म का अजीब विरोधाभास 🤐
आज स्थिति यह है कि भाषाई अक्षमता को ‘कॉन्वेंट शिक्षा’ के पदक की तरह पहना जाता है। हाल ही में मैंने एक पिता को अपने बेटे की खराब तमिल पर गर्व करते देखा। उन्होंने बड़े चाव से कहा, “मेरे बेटे की तमिल बहुत खराब है, आखिर वह शहर के सबसे बेहतरीन अंग्रेजी स्कूल में जो पढ़ा है।” उनके स्वर में जो गर्व था, वह वास्तव में एक गहरे ‘आत्म-घृणा’ (self-loathing) का संकेत है।
यह मानसिकता हमें सिखाती है कि हम जितने कम ‘भारतीय’ दिखेंगे, उतने ही अधिक ‘आधुनिक’ या ‘सफेद’ (Westernized) कहलाएंगे। हमने अपनी भाषा को ‘स्थानीय’ कहकर उसे एक भौगोलिक सीमा में कैद कर दिया, जबकि अंग्रेजी को हमने ‘सार्वभौमिक’ होने का दर्जा दे दिया। यह विरोधाभास हमारे आत्म-सम्मान को भीतर से खोखला कर रहा है।
5. भारत बनाम विश्व: अन्य पूर्व उपनिवेशों से तुलना 🌏
जब मैं अन्य पूर्व यूरोपीय उपनिवेशों की यात्रा करता हूँ, तो भारत की यह भाषाई हीनभावना और भी स्पष्ट हो जाती है। दुनिया के अन्य देशों ने अपनी औपनिवेशिक विरासत (अंग्रेजी या फ्रेंच) और अपनी जड़ों के बीच एक बहुत ही स्वस्थ और आत्मविश्वास से भरा संतुलन बनाया है।
नीचे दी गई तालिका स्पष्ट करती है कि भारत और अन्य देशों के भाषाई आत्मविश्वास में कितना गहरा अंतर है:
| देश/क्षेत्र | भाषाई स्थिति (Source Context के अनुसार) | भाषाई आत्मविश्वास |
| भारत (Gen Z) | मातृभाषा में अशिक्षा पर गर्व, अंग्रेजी भी औसत | निम्न (आत्म-घृणा) |
| श्रीलंका | सिंहली और तमिल का पूर्ण ज्ञान और उपयोग | उच्च |
| मोरक्को | फ्रेंच के साथ अरबी/बर्बर में पूर्ण निपुणता | उच्च |
| फिलिस्तीन/जॉर्डन | अंग्रेजी के साथ अरबी लिपि का सहज उपयोग | उच्च (आत्मविश्वासी द्विभाषी) |
| म्यांमार | बर्मी भाषा का पूर्ण संरक्षण और दैनिक उपयोग | उच्च |
मैंने फिलिस्तीन के वेस्ट बैंक में ऐसे युवाओं से मुलाकात की जो न केवल बेहतरीन अंग्रेजी बोलते थे, बल्कि अपनी अरबी विरासत पर भी उतना ही गर्व करते थे। वे ‘द्विभाषी’ थे, ‘अर्धभाषी’ नहीं। उनके लिए अंग्रेजी एक औजार थी, जबकि भारत में यह एक धर्म बन गई है।
6. व्हाट्सएप और लिपि का संकट: क्या हम अपनी लिखावट खो रहे हैं? 🖋️
डिजिटल युग ने इस संकट को एक नई दिशा दी है—लिपियों का विलुप्तीकरण। जहाँ अरब देशों, ईरान या मिस्र के युवा अपने व्हाट्सएप संदेश अपनी मूल लिपि (Arabic Script) में टाइप करते हैं, वहीं भारतीय युवा हिंदी, बंगाली या पंजाबी लिखने के लिए भी ‘लैटिन’ (अंग्रेजी) वर्णमाला का सहारा लेते हैं।
यह केवल सुविधा का मामला नहीं है, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक सरेंडर (surrender) है। जब हम अपनी लिपि खो देते हैं, तो हम उस भाषा के साहित्य और इतिहास से जुड़ने का अंतिम सूत्र भी तोड़ देते हैं। बिना लिपि के कोई भी भाषा केवल एक ‘बोली’ बनकर रह जाती है, जिसकी कोई बौद्धिक गहराई नहीं होती। हम धीरे-धीरे अपनी आँखों के सामने अपनी लिखावट को मरते हुए देख रहे हैं।
7. “नेटफ्लिक्स वाली अंग्रेजी”: क्या सच में हम अंग्रेजी में बेहतर हुए हैं? 📺
यहाँ एक कड़वा सच यह भी है कि अपनी मातृभाषा का बलिदान देने के बाद भी, आज की युवा पीढ़ी की अंग्रेजी वह नहीं है जिस पर गर्व किया जा सके। अगर हम अपने दादा-दादी की पीढ़ी को देखें, तो उनकी अंग्रेजी में एक सहज स्पष्टता (unstilted command) और गरिमा होती थी, क्योंकि उनकी भाषाई नींव मजबूत थी।
इसके विपरीत, आज के ‘जेन-जी’ की अंग्रेजी किताबों से नहीं, बल्कि ‘नेटफ्लिक्स’ (Netflix) के सबटाइटल्स और अमेरिकी पॉप कल्चर से आती है। उनकी भाषा ‘अमेरिकानिस्म’ (Americanisms) से भरी हुई है, जिसमें न तो गहराई है और न ही स्पष्टता। यह विडंबना ही है कि हमने ‘तेलुगु’ भी खो दी और जो ‘अंग्रेजी’ पाई, वह भी केवल औसत (mediocre) दर्जे की है। हम भाषाओं के एक ऐसे घालमेल में जी रहे हैं जहाँ हम न तो अपनी भावनाओं को अपनी भाषा में व्यक्त कर सकते हैं, न ही अंग्रेजी में।
8. द्विभाषी होने का भ्रम: न इधर के रहे न उधर के 🧩
आज का युवा खुद को ‘बायलैंग्वल’ (bilingual) कहता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि वह किसी भी एक भाषा में पूर्ण नहीं है।
“किसी भी विदेशी भाषा की बारीकियों और उसके सौंदर्य को वही व्यक्ति समझ सकता है जिसने अपनी मातृभाषा की गहराई को चखा हो। जब आपकी अपनी जमीन कमजोर होती है, तो उस पर खड़ी की गई विदेशी भाषा की इमारत हमेशा डगमगाती रहती है।”
यही कारण है कि आज भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी शब्दों की इतनी भरमार हो गई है कि वे भाषाएं अपनी मौलिकता खो रही हैं। यह भाषाई समृद्धि नहीं, बल्कि ‘भाषाई दरिद्रता’ का प्रमाण है। हम दो भाषाओं के बीच एक ऐसे ‘नो मैन्स लैंड’ (No Man’s Land) में खड़े हैं जहाँ से अपनी जड़ें दिखाई नहीं देतीं।
9. भाषाई पदानुक्रम के मनोवैज्ञानिक प्रभाव 🧠
भारतीयों की एक पुरानी और घातक आदत है—हर चीज को ऊंच-नीच (hierarchy) के चश्मे से देखना। एक मिस्रवासी के लिए अरबी और अंग्रेजी दो अलग-अलग संचार के माध्यम हैं, जिनमें कोई ‘बेहतर’ या ‘घटिया’ नहीं है। लेकिन एक भारतीय के लिए, जो भाषा ‘नीचे’ है, उससे शर्मिंदा होना उसकी सामाजिक नियति बन जाती है।
यह मानसिकता हमारे आत्मविश्वास को भीतर से खोखला करती है। जब हम अपनी भाषा को ‘निम्न’ मानते हैं, तो हम अवचेतन रूप से खुद को भी दुनिया के सामने ‘निम्न’ महसूस कराने लगते हैं। यह ‘न्यूट्रलिटी’ का अभाव ही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है।
10. “एक्सपायरी डेट”: दोषारोपण से सुधार की ओर ⏳
प्रसिद्ध लेखिका जे.के. राउलिंग ने एक बार कहा था कि अपने माता-पिता को दोष देने की भी एक ‘एक्सपायरी डेट’ (समाप्ति तिथि) होती है। माना कि जेन-एक्स माता-पिता ने आपको अपनी भाषा से दूर रखा, लेकिन अब आप वयस्क हैं।
अपनी भाषाई अशिक्षा पर गर्व करना बंद कीजिए। अपनी मातृभाषा के स्वर और व्यंजनों (vowels and consonants) की पहचान न होना कोई सम्मान की बात नहीं, बल्कि एक बौद्धिक दरिद्रता है। यदि आप अपनी जड़ों का सम्मान नहीं कर सकते, तो आपका ‘राष्ट्रवाद’ या ‘सांस्कृतिक गर्व’ केवल सोशल मीडिया के खोखले नारों तक सीमित है।
11. वास्तविक द्विभाषीवाद (Bilingualism) का महत्व 🤝
एक सच्चा वैश्विक नागरिक बनने के लिए हमें मातृभाषा और अंग्रेजी, दोनों के साथ एक स्वस्थ संतुलन बनाना होगा। अंग्रेजी वह खिड़की है जिससे हम दुनिया को देखते हैं, लेकिन मातृभाषा वह जमीन है जिस पर हम खड़े होते हैं। इन दोनों के बीच कोई युद्ध नहीं होना चाहिए। हमें ‘खराब तेलुगु और औसत अंग्रेजी’ के दलदल से निकलकर ‘सशक्त तेलुगु और उत्कृष्ट अंग्रेजी’ के शिखर की ओर बढ़ना होगा।
12. आधुनिक भारत के लिए एक चेतावनी ⚠️
यदि हम अपनी भाषाओं को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखेंगे, तो दुनिया के सामने हमारा आत्मसम्मान (amour propre) हमेशा कमजोर ही रहेगा। एक आत्मनिर्भर भारत की कल्पना तब तक अधूरी है जब तक हम अपनी भाषाई अस्मिता को पुनर्जीवित नहीं करते। बिना अपनी जड़ों के, हम वैश्विक मंच पर केवल पश्चिम की एक धुंधली नकल बनकर रह जाएंगे।
13. निष्कर्ष: अ आ इ ई और A B C D का संतुलन ✨
समय आ गया है कि हम अपनी भाषाओं को ‘लोकल’ या ‘क्षेत्रीय’ कहना बंद करें और उन्हें अपनी ‘विरासत’ का दर्जा दें। विशाखापत्तनम की उस लड़की या दिल्ली के किसी भी युवा के लिए अपनी भाषा न पढ़ पाना एक बड़ी सांस्कृतिक क्षति होनी चाहिए, न कि गर्व का विषय।
हमें ‘अ आ इ ई’ और ‘A B C D’ के बीच एक सेतु बनाना होगा। अपनी जड़ों की ओर लौटना पीछे मुड़ना नहीं, बल्कि भविष्य के लिए खुद को तैयार करना है। क्या हम फिर से अपनी भाषा को वह गरिमा दिला पाएंगे जिसकी वह सदियों से हकदार रही है?
14. सरकारी नीति और संदर्भ (Relevant Policy Context) 📜
इस भाषाई संकट को पहचानते हुए, भारत सरकार की वर्तमान नीतियां भी अब मातृभाषा में शिक्षा के महत्व को प्राथमिकता दे रही हैं।
- विषय: National Education Policy 2020 (NEP 2020)
- संख्या: F.No.1-1/2016-SECY(P)
- दिनांक: 29 जुलाई 2020
- प्रमुख बिंदु: यह नीति इस वैज्ञानिक सत्य को स्वीकार करती है कि बच्चे अपनी मातृभाषा में अधिक तेजी से और गहराई से सीखते हैं। यह प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर मातृभाषा/स्थानीय भाषा के उपयोग को अनिवार्य करने की वकालत करती है।
- URL: https://www.education.gov.in/sites/upload_files/mhrd/files/NEP_Final_English_0.pdf
15. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) ❓
1. क्या अंग्रेजी सीखने से वाकई हमारी अपनी भाषा कमजोर होती है? नहीं, सीखना कभी कमजोरी नहीं होता। समस्या तब है जब हम अपनी भाषा की कीमत पर दूसरी भाषा सीखते हैं। शोध बताते हैं कि जो बच्चे अपनी मातृभाषा में मजबूत होते हैं, वे अंग्रेजी या कोई भी अन्य विदेशी भाषा कहीं अधिक तेजी से और बेहतर तरीके से सीखते हैं।
2. Gen X माता-पिता ने अंग्रेजी को इतना अंधाधुंध महत्व क्यों दिया? 1960-80 के दशक की उस पीढ़ी ने लाइसेंस राज और सीमित अवसरों के बीच संघर्ष किया था। उनके लिए अंग्रेजी ‘नौकरी’ और ‘आधुनिकता’ का एकमात्र पासपोर्ट थी। इस आर्थिक सुरक्षा की होड़ में, उन्होंने भाषाई और सांस्कृतिक सुरक्षा को नजरअंदाज कर दिया।
3. भाषाई संदर्भ में ‘शून्य-योग खेल’ (Zero-Sum Game) का क्या मतलब है? इसका अर्थ है यह गलत धारणा कि अगर हमें अंग्रेजी को बढ़ाना है, तो अपनी भाषा को कम करना होगा। जैसे एक का लाभ दूसरे की हानि हो। जबकि भाषाएं एक-दूसरे की पूरक होनी चाहिए, प्रतियोगी नहीं।
4. क्या बिना अपनी लिपि जाने हम अपनी संस्कृति को बचा सकते हैं? असंभव। लिपि केवल अक्षरों का समूह नहीं, बल्कि उस संस्कृति का डीएनए है। बिना लिपि के आप अपने मूल ग्रंथों, कविता और दर्शन से सीधे नहीं जुड़ सकते। लिपि छोड़ना अपनी विरासत की वसीयत को फाड़ने जैसा है।
5. एक युवा वयस्क के रूप में अपनी मातृभाषा को फिर से कैसे सीखें? सबसे पहले इस मिथ्या गर्व को त्यागें कि “मुझे अपनी भाषा नहीं आती।” वर्णमाला से शुरुआत करें, अपनी लिपि में छोटे संदेश लिखें, और अपनी भाषा के महान लेखकों को पढ़ना शुरू करें। भाषा सीखना कोई गंतव्य नहीं, अपनी जड़ों की ओर एक यात्रा है।
Written by CBSERanker Team
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