शिक्षा की दुनिया में जब भी भाषा की बात आती है, तो अक्सर हमारा ध्यान ‘मानक’ और ‘शुद्ध’ भाषा की ओर चला जाता है। लेकिन एक भाषाविद् और शिक्षा संपादक के रूप में, मेरा मानना है कि हमें शब्दों के उस मायाजाल से बाहर निकलकर देखने की जरूरत है जिसे हम अक्सर ‘शिक्षा व्यवस्था’ कहते हैं। क्या हमारी नीतियां वास्तव में उस बच्चे की आवाज सुन पा रही हैं जो अपनी एक समृद्ध भाषाई विरासत लेकर स्कूल आता है? आज हम ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ (NEP 2020) के उन दावों की परतों को खोलेंगे जो बहुभाषावाद के नाम पर पेश किए गए हैं, और यह समझने की कोशिश करेंगे कि क्या हम वास्तव में प्रगति कर रहे हैं या बस पुराने रास्तों पर नए लेबल चिपका रहे हैं।
प्रस्तावना: अजमेर की एक कक्षा से सीख 🏫
कल्पना कीजिए राजस्थान के अजमेर की एक तपती दोपहर और वहां के एक सरकारी स्कूल की कक्षा। उस कक्षा में बैठा हर बच्चा अपने साथ केवल किताबों का बोझ लेकर नहीं आता, बल्कि वह अपने भीतर एक अद्वितीय ‘भाषाई पूंजी’ (verbal repertoire) समेटे हुए होता है। कोई बच्चा घर में मारवाड़ी बोलता है, कोई मेवाती, तो कोई आपस में हिंदी के ही किसी स्थानीय रूप का उपयोग करता है।
अजमेर की यह कक्षा दरअसल पूरे भारत का एक लघु रूप है। यहाँ ‘विविधता’ कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे बाहर से थोपा गया हो; यह इस मिट्टी की डिफ़ॉल्ट वास्तविकता है। जब बच्चा स्कूल की दहलीज पर कदम रखता है, तो वह भाषाई रूप से पहले से ही सक्षम और समृद्ध होता है। लेकिन विडंबना देखिए, जैसे ही वह कक्षा में प्रवेश करता है, उसे यह महसूस कराया जाता है कि उसकी भाषा ‘अशुद्ध’ है और उसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपनी जड़ों को काटकर एक ‘मानक’ भाषा के पिंजरे में खुद को कैद करना होगा।
एक संवेदनशील शिक्षक और नीति निर्माता के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह बच्चे की इस स्वाभाविक भाषाई शक्ति को कुचलने के बजाय उसे सीखने का माध्यम बनाए। क्या NEP 2020 इस मर्म को समझ पाया है? आइए, गहराई से विश्लेषण करें।
‘शुद्ध’ और ‘मानक’ भाषा के भ्रम को तोड़ना 🗣️
भाषा विज्ञान के नजरिए से देखें तो ‘शुद्ध’ या ‘अशुद्ध’ जैसा कुछ नहीं होता। यह केवल एक संभ्रांतवादी (elite) अवधारणा है जिसे समाज के शक्तिशाली वर्गों ने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए गढ़ा है। हमें यह समझना होगा कि दुनिया की हर भाषा, चाहे वह हजारों वर्षों के लिखित इतिहास वाली संस्कृत हो या जंगलों की गूँज में बसी संताली, वैज्ञानिक रूप से उतनी ही व्यवस्थित और तरल (fluid) होती है।
एक भाषाविद् के रूप में, मैं यह जोर देकर कहता हूँ कि जब हम किसी भाषा को ‘बोली’ कहकर उसे कमतर आंकते हैं, तो हम वास्तव में उस समुदाय की ज्ञान परंपरा का अपमान कर रहे होते हैं। मानक भाषा अक्सर एक ‘पिंजरे’ की तरह काम करती है जो बच्चे की रचनात्मकता को सीमित कर देती है, जबकि उसकी मातृभाषा ‘खुले आसमान’ की तरह है जहाँ वह अपने विचारों की उड़ान भर सकता है। हमें ऐसी शिक्षा संस्कृति विकसित करनी होगी जहाँ संस्कृत और संताली के बारे में एक ही सांस में और समान सम्मान के साथ बात की जा सके। तरलता ही भाषा का वास्तविक गुण है, स्थिरता या शुद्धता नहीं।
कक्षाओं का वास्तविक स्वरूप: डिफ़ॉल्ट रूप से बहुभाषी 🇮🇳
भारतीय कक्षाओं का सबसे सुंदर और चुनौतीपूर्ण पहलू यह है कि वे ‘डिफ़ॉल्ट रूप से बहुभाषी’ हैं। इसका मतलब यह है कि कक्षा में कोई एक भाषा नहीं, बल्कि भाषाओं की कई धाराएं एक साथ बहती हैं। एक बच्चा अगर संथाली बोलता है, तो दूसरा उड़िया और तीसरा शायद बांग्ला। नीतियों में अक्सर ‘विविधता’ को एक समस्या या बाधा के रूप में देखा जाता है जिसे ‘हल’ करने की जरूरत है।
लेकिन असलियत यह है कि यह विविधता ही सीखने का सबसे बड़ा संसाधन है। जब हम कक्षा को ‘एकभाषी’ बनाने की जिद करते हैं, तो हम वास्तव में सीखने की प्रक्रिया को बाधित कर रहे होते हैं। भारतीय संदर्भ में बहुभाषावाद एक जीवनशैली है, कोई अकादमिक विलासिता नहीं। दुर्भाग्य से, हमारी नीतियां अक्सर इस जमीनी सच्चाई की अनदेखी करती हैं और एक ऐसी एकरूपता थोपने की कोशिश करती हैं जो हमारे सामाजिक ताने-बाने से मेल नहीं खाती।
NEP 2020 का विश्लेषण: नया विजन या पुरानी बातों का दोहराव? 🧐
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के खंड 4.11 से 4.22 तक ‘बहुभाषावाद और भाषा की शक्ति’ पर काफी विस्तार से चर्चा की गई है। पहली नज़र में यह बहुत प्रभावशाली लगता है, लेकिन यदि आप एक आलोचक की दृष्टि से देखें, तो यहाँ कई प्रश्न खड़े होते हैं। नीति ‘बहुभाषावाद’ शब्द का उपयोग तो बार-बार करती है, लेकिन इसकी कोई ठोस और वैज्ञानिक परिभाषा देने में विफल रहती है।
तथ्यात्मक रूप से, यह नीति काफी हद तक 1968 और 1986 (संशोधित 1992) की शिक्षा नीतियों का ही दोहराव है। मातृभाषा में शिक्षा, त्रि-भाषा सूत्र और क्षेत्रीय भाषाओं के विकास की बातें हम दशकों से सुनते आ रहे हैं। NEP 2020 इसमें कुछ नया और क्रांतिकारी जोड़ने के बजाय यथास्थिति को ही कुछ नए शब्दों के साथ पेश करती है।
सबसे अधिक चिंताजनक यह है कि यह नीति ‘राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा’ (NCF 2005) के उन महत्वपूर्ण सुझावों को सिरे से खारिज करती है या उन्हें नजरअंदाज करती है जिन्होंने बहुभाषावाद को एक ‘संसाधन’ और ‘संज्ञानात्मक लाभ’ (cognitive advantage) के रूप में देखा था। NCF 2005 अधिक प्रगतिशील था क्योंकि उसने भाषा को केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि सोचने और सीखने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया के रूप में स्वीकारा था। इसके विपरीत, NEP 2020 इस गंभीर विषय को अक्सर ‘मजेदार प्रोजेक्ट्स’ या ‘सांस्कृतिक गौरव’ तक सीमित कर देती है।
नीति बनाम वास्तविकता: एक तुलनात्मक अध्ययन 📊
नीचे दी गई तालिका के माध्यम से हम यह समझ सकते हैं कि पिछली नीतियों और वर्तमान नीति के बीच भाषाई दृष्टिकोण में कितना अंतर है और कहाँ हम अभी भी अटके हुए हैं:
| विशेषता | NEP 1968 / 1986 | NEP 2020 | विश्लेषण (Editor’s View) |
| मुख्य फोकस | त्रि-भाषा सूत्र और क्षेत्रीय भाषाओं का औपचारिक ढांचा। | बहुभाषावाद का उत्सव और शास्त्रीय भाषाओं (विशेषकर संस्कृत) पर जोर। | नीति में भावुकता बढ़ी है, लेकिन क्रियान्वयन का ढांचा पुराना ही है। |
| नया दृष्टिकोण | बुनियादी ढांचे और स्कूलों तक पहुंच सुनिश्चित करना। | ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ के माध्यम से भाषाई एकता का वृत्तांत। | यह दृष्टिकोण वैज्ञानिक के बजाय अधिक वैचारिक और सांस्कृतिक है। |
| भाषाई संसाधन | स्थानीय भाषाओं को केवल प्राथमिक स्तर तक सीमित रखना। | सैद्धांतिक रूप से बहुभाषावाद को स्वीकार करना, पर NCF 2005 के विजन की कमी। | नीति यह नहीं बताती कि वास्तव में एक बहुभाषी कक्षा को कैसे संचालित किया जाए। |
| अंग्रेजी की भूमिका | अंग्रेजी को ‘शक्ति की भाषा’ के रूप में देखा गया। | अंग्रेजी पर चुप्पी, लेकिन ‘वैश्विक भाषा’ के रूप में उसकी जरूरत को स्वीकारना। | नीति और जमीनी मांग (अंग्रेजी माध्यम) के बीच एक स्पष्ट विरोधाभास है। |
हाशियाकरण का दर्द: पूर्वोत्तर और अल्पसंख्यक भाषाओं की स्थिति 🌏
भाषा केवल संवाद का साधन नहीं है, बल्कि यह पहचान और गरिमा का प्रश्न है। पापिया सेनगुप्ता (2021) का शोध इस बात की ओर इशारा करता है कि भाषाई परिभाषाओं की अस्पष्टता के कारण अल्पसंख्यक भाषाओं और विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत की भाषाओं को हाशिए पर धकेल दिया गया है।
जब हम शिक्षा की नीति बनाते हैं और उसमें केवल ‘प्रमुख’ या ‘शास्त्रीय’ भाषाओं को ही स्थान देते हैं, तो हम उन सैकड़ों बोलियों और भाषाओं को अदृश्य कर देते हैं जो पूर्वोत्तर के राज्यों में बोली जाती हैं। इसका सीधा परिणाम वहां की ‘ड्रॉपआउट रेट’ (dropout rate) में देखा जा सकता है। जब एक नागा या मिज़ो बच्चा स्कूल आता है और उसे वह भाषा नहीं मिलती जिसे वह समझता है, तो वह व्यवस्था से कट जाता है। यह विच्छेदन केवल भाषाई नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक भी होता है।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि यदि कोई छात्र अपनी भाषा में शिक्षा प्राप्त नहीं कर पा रहा है, तो दोष छात्र का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जो उसकी भाषाई पहचान को स्वीकार करने से इनकार करती है। पूर्वोत्तर में छात्रों के बीच जो अलगाव की भावना देखी जाती है, उसका एक बड़ा कारण भाषाई वर्चस्ववाद है।
क्या ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ पर्याप्त है? 🇮🇳
NEP 2020 ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ कार्यक्रम के माध्यम से भाषाई एकता को बढ़ावा देने की बात करती है। इसमें संस्कृत को सभी भारतीय भाषाओं की जननी के रूप में महिमामंडित किया गया है और छात्रों को इस ‘गौरवशाली भारत’ के वृत्तांत में शामिल करने के लिए मजेदार गतिविधियों का सुझाव दिया गया है।
लेकिन यहाँ एक बुनियादी सवाल उठता है: क्या असली ‘श्रेष्ठ भारत’ किसी एक भाषा के प्रभुत्व में है? एक भाषाविद् के तौर पर मेरा जवाब है—नहीं। असली एकता तो उन हजारों भाषाओं की तरलता और आपसी लेन-देन में है जो सदियों से इस मिट्टी में बसती आई हैं। ‘श्रेष्ठ भारत’ वह है जहाँ एक संथाली गीत और एक संस्कृत श्लोक को एक ही मंच पर समान सम्मान मिले। किसी एक भाषा या पाठ (text) को विशेषाधिकार देना भारत जैसे बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक देश की नींव को कमजोर कर सकता है। हमें राष्ट्रवाद के चश्मे से हटकर भाषाई न्याय के चश्मे से देखना होगा।
भारतीय भाषाओं की साझा वैज्ञानिक संरचना 🧬
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि इतनी सारी भाषाओं के कारण भारत में एकता मुश्किल है। लेकिन विज्ञान कुछ और ही कहता है। भारत वास्तव में एक ‘भाषाई क्षेत्र’ (Linguistic Area) है जहाँ भाषाओं के बीच एक गहरी संरचनात्मक समानता है। यह वैज्ञानिक सूत्र हमें आपस में जोड़ता है, चाहे हमारी लिपियां कितनी ही अलग क्यों न हों।
क्रिया-अंतिम (Verb-final) संरचना का विज्ञान 🧠
भारतीय भाषाओं की सबसे अनूठी विशेषता उनकी वाक्य संरचना है। मेघालय में बोली जाने वाली ‘खासी’ भाषा को छोड़कर, लगभग सभी भारतीय भाषाएं ‘Verb-final’ (क्रिया-अंतिम) होती हैं। इसे एक उदाहरण से समझते हैं:
- अंग्रेजी (S-V-O): I eat an apple. (यहाँ क्रिया ‘eat’ वाक्य के बीच में है)
- हिंदी (S-O-V): मैं सेब खाता हूँ। (यहाँ क्रिया ‘खाता हूँ’ वाक्य के अंत में है)
- मराठी (S-O-V): मी सफरचंद खातो.
- संताली (S-O-V): इञ् सेब-इञ् जअम-एत-आ.
यह संरचनात्मक समानता दर्शाती है कि हमारा सोचने का और संसार को देखने का ढंग बुनियादी तौर पर एक जैसा है। जब हम यह कहते हैं कि भारतीय भाषाएं आपस में जुड़ी हैं, तो इसका आधार केवल संस्कृत नहीं, बल्कि यह साझा व्याकरणिक ढांचा भी है।
शब्द द्विरुक्ति (Word Reduplication) का जादू ✨
भारतीय भाषाओं की एक और साझा खूबसूरती है ‘शब्दों को दोहराना’। यह हमारी संज्ञानात्मक प्रक्रिया का हिस्सा है जो अर्थ को विस्तार देता है।
- वितरणात्मक अर्थ (Distributive): जैसे ‘घर-घर’ (अर्थात प्रत्येक घर में)। यह केवल हिंदी में नहीं, बल्कि तमिल, तेलुगु और कश्मीरी में भी इसी तरह काम करता है।
- इत्यादि अर्थ (Etcetera): जैसे ‘चाय-वाय’ या ‘खाना-वाना’। यहाँ ‘वाय’ या ‘वाना’ का अपना कोई स्वतंत्र अर्थ नहीं है, लेकिन यह दर्शाता है कि चाय के साथ कुछ और भी (नाश्ता आदि) शामिल है।
यह ‘द्विरुक्ति’ का जादू भारतीय उपमहाद्वीप की लगभग हर बोली में मिलता है। यह हमारी साझा सांस्कृतिक समझ और भाषाई सरलता का प्रमाण है।
सामाजिक-भाषाई एकता और सम्मान के स्वर 🙏
भाषा केवल व्याकरण नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार भी है। भारतीय समुदायों में ‘विनम्रता रणनीतियों’ (politeness strategies) का एक साझा तंत्र है। हम सभी भाषाओं में बड़ों के लिए ‘तू’ के बजाय ‘आप’ जैसे सम्मानजनक सर्वनामों (honorific pronouns) का उपयोग करते हैं। अंग्रेजी जैसी भाषाओं में यह अंतर बहुत सीमित है, लेकिन भारतीय भाषाओं में यह सामाजिक मर्यादा और रिश्तों की गहराई को दर्शाने का एक सशक्त माध्यम है। यह साझा शिष्टाचार हमें एक भाषाई सूत्र में पिरोता है।
भाषा: वैज्ञानिक जांच और ज्ञान का मंच 🔬
हमें अब शिक्षार्थियों की भाषा को एक ‘समस्या’ के बजाय एक ‘संसाधन’ के रूप में देखना शुरू करना होगा। शिक्षा का उद्देश्य छात्र को उसकी अपनी भाषा से काटकर किसी और भाषा का गुलाम बनाना नहीं, बल्कि उसकी भाषा को वैज्ञानिक जांच (scientific enquiry) का आधार बनाना होना चाहिए।
एक प्रभावी शिक्षा पद्धति वह है जहाँ बच्चा अपनी भाषा के माध्यम से तर्क करना, सवाल उठाना और प्रयोग करना सीखे। जब हम कक्षा में बच्चे की मातृभाषा को सम्मान देते हैं, तो हम वास्तव में उसके आत्मविश्वास को बढ़ा रहे होते हैं। विज्ञान, गणित या भूगोल जैसे विषय भी तब बेहतर समझ में आते हैं जब उन्हें उन शब्दों में समझाया जाए जो बच्चे के दिल और दिमाग के सबसे करीब हों।
अनुवाद और रचनात्मकता का महत्व 🎨
अनुवाद केवल एक भाषा से दूसरी भाषा में शब्दों को बदलना नहीं है; यह ज्ञान का पुनर्सृजन है। हमें छात्रों को प्रोत्साहित करना चाहिए कि वे आधुनिक ज्ञान (जो अक्सर अंग्रेजी में उपलब्ध है) को अपनी मातृभाषाओं में अनुवाद करें।
साथ ही, यह भी उतना ही जरूरी है कि छात्र अपनी भाषाओं में छिपे हुए पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों, मुहावरों, लोककथाओं और वैज्ञानिक दृष्टिकोणों को दुनिया के सामने लाएं। इससे न केवल उनकी अपनी रचनात्मकता समृद्ध होगी, बल्कि पूरी दुनिया भारतीय भाषाओं की गहराई से परिचित हो सकेगी। अनुवाद को एक बोझ नहीं, बल्कि एक ‘रचनात्मक सेतु’ के रूप में देखा जाना चाहिए।
निष्कर्ष: विविधता का सम्मान ही भविष्य है 🌟
बहुभाषावाद केवल कागजों पर लिखी जाने वाली कोई नीति नहीं है, बल्कि यह हमारे देश की आत्मा है। ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ के दावों और हकीकत के बीच जो खाई है, उसे केवल संवेदना और वैज्ञानिक समझ से ही भरा जा सकता है। हमें एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था की दरकार है जो बच्चे को उसकी जड़ों से न काटे, बल्कि उसे उन जड़ों से पोषण लेकर आसमान छूने की ताकत दे।
‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ का सपना केवल नारों से पूरा नहीं होगा। यह तब सच होगा जब अजमेर की उस कक्षा में बैठा हर बच्चा यह महसूस करेगा कि उसकी भाषा उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि किसी भी अन्य ‘मानक’ भाषा की। असली एकता विविधता को मिटाने में नहीं, बल्कि उसे सहेजने और उसका जश्न मनाने में है।
अंत में, हमें खुद से यह सवाल पूछना चाहिए: क्या हम वास्तव में अपनी भाषाई जड़ों को बचाने के लिए तैयार हैं, या हम अनजाने में अपनी ही विविधता को ‘शुद्धता’ की वेदी पर बलि चढ़ा रहे हैं? फैसला हमें करना है—एक पिंजरे जैसा अनुशासन या खुले आसमान जैसी भाषाई आजादी?
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) ❓
प्रश्न 1: NEP 2020 बहुभाषावाद को कैसे परिभाषित करता है? उत्तर: NEP 2020 बहुभाषावाद को शिक्षा के एक अनिवार्य हिस्से के रूप में प्रस्तुत करता है, लेकिन इसकी वैज्ञानिक परिभाषा देने के बजाय यह इसे ‘सांस्कृतिक गौरव’ और ‘त्रि-भाषा सूत्र’ के इर्द-गिर्द सीमित रखता है। यह 1968 और 1986 की नीतियों के ही भाषाई रुख को दोहराता है और संस्कृत जैसी शास्त्रीय भाषाओं पर विशेष जोर देता है, जबकि आधुनिक भाषाई जरूरतों पर इसकी रूपरेखा कुछ धुंधली है।
प्रश्न 2: भाषाई हाशिए पर रहने का छात्रों पर क्या प्रभाव पड़ता है? उत्तर: जब छात्रों की घरेलू भाषा या मातृभाषा को स्कूल में जगह नहीं मिलती, तो वे अपनी पहचान के प्रति असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। पापिया सेनगुप्ता के अनुसार, अल्पसंख्यक और पूर्वोत्तर की भाषाओं की अनदेखी के कारण इन क्षेत्रों में प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर (dropout rate) काफी अधिक है। छात्र उस पाठ्यक्रम से जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते जो उनकी भाषा का सम्मान नहीं करता।
प्रश्न 3: क्या भारतीय भाषाएं वास्तव में एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं? उत्तर: हाँ, भारतीय भाषाएं संरचनात्मक रूप से बहुत करीब हैं। खासी को छोड़कर लगभग सभी भारतीय भाषाएं ‘क्रिया-अंतिम’ (verb-final) हैं। साथ ही, इनमें शब्द द्विरुक्ति (जैसे घर-घर, चाय-वाय) और सम्मानजनक सर्वनामों (honorific pronouns) के उपयोग की साझा विशेषताएं पाई जाती हैं, जो हमें एक विशिष्ट ‘भाषाई क्षेत्र’ बनाती हैं।
प्रश्न 4: त्रि-भाषा सूत्र और NEP 2020 में क्या संबंध है? उत्तर: NEP 2020 त्रि-भाषा सूत्र के प्रति पुरानी नीतियों (1968 और 1986) के लचीले रुख को ही जारी रखता है। यह कहता है कि किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह त्रि-भाषा सूत्र के क्रियान्वयन की उन समस्याओं का समाधान नहीं करता जो दशकों से बनी हुई हैं, जैसे शिक्षकों की कमी और भाषाई संसाधनों का अभाव।
प्रश्न 5: शिक्षा में ‘शुद्ध भाषा’ की धारणा गलत क्यों है? उत्तर: ‘शुद्ध’ या ‘मानक’ भाषा की धारणा संभ्रांतवादी है और यह भाषाओं के स्वाभाविक विकास को रोकती है। वैज्ञानिक रूप से सभी भाषाएं और बोलियां समान रूप से व्यवस्थित होती हैं। शिक्षा में ‘शुद्धता’ पर जोर देने से बच्चों की स्वाभाविक भाषाई पूंजी और उनकी सहज रचनात्मकता का दमन होता है, जिससे वे सीखने की प्रक्रिया में पीछे छूट जाते हैं।
सरकारी परिपत्र संदर्भ (Circular Reference) 📄
- Circular Subject: National Education Policy 2020 (Language and Multilingualism Sections 4.11 – 4.22)
- Circular Number/Reference: Ministry of Education, Government of India (NEP 2020)
- Dated: July 29, 2020
- Link: https://www.education.gov.in/sites/upload_files/mhrd/files/NEP_Final_English_0.pdf
Written by CBSERanker Team
Educational content creators focused on CBSE Computer Science,
Python, and exam preparation.

