‘भाषा-वॉशिंग’ और भारतीय शिक्षा में भाषा की राजनीति: क्या हम असली शिक्षा खो रहे हैं?

आज के भारत में भाषा केवल संवाद का सेतु नहीं, बल्कि एक जटिल राजनीतिक कुरुक्षेत्र बन चुकी है। राज्यों के बीच भाषाई वर्चस्व को लेकर छिड़ी खींचतान हो रही है, और राजनीतिक मंचों से प्रखरता के साथ यह घोषणा की जा रही है कि आने वाले समय में भारतीय नागरिक अंग्रेजी बोलने में “शर्म” महसूस करेंगे। लेकिन इस गरमा-गरम विमर्श के शोर में, क्या हमने कभी उन शांत कक्षाओं की ओर झांकने की कोशिश की है जहाँ हमारे देश का भविष्य आकार ले रहा है? क्या हमने यह समझने का प्रयास किया है कि भाषाई अस्मिता की यह राजनीति छात्र के संज्ञानात्मक और मनोवैज्ञानिक विकास को किस तरह प्रभावित कर रही है?

समकालीन शैक्षणिक संस्थानों पर ‘सांस्कृतिक प्रामाणिकता’ का एक ऐसा मुखौटा ओढ़ने का भारी सामाजिक-भाषाई दबाव है, जो अक्सर उनकी आंतरिक नीतिगत विफलता और खोखली व्यवस्थाओं को ढंकने का काम करता है। इसी परिदृश्य के बीच एक अत्यंत सूक्ष्म लेकिन खतरनाक प्रवृत्ति उभरी है, जिसे समाजशास्त्रीय शब्दावली में ‘भाषा-वॉशिंग’ (Bhasha-washing) कहा जा सकता है। यह लेख इसी अवधारणा का विश्लेषण करने और यह पड़ताल करने का एक प्रयास है कि क्या हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों को वास्तव में सींच रहे हैं, या हम केवल प्रतीकों की राजनीति के मोहपाश में फंसकर वास्तविक शिक्षा की बलि चढ़ा रहे हैं।

📍 मोहिनी गुप्ता की महत्वपूर्ण खोज: ‘भाषा-वॉशिंग’ का जन्म

‘भाषा-वॉशिंग’ की अवधारणा किसी बंद कमरे में तैयार किया गया सिद्धांत नहीं है, बल्कि यह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की वरिष्ठ शोधकर्ता मोहिनी गुप्ता के गहन और विस्तृत ‘फील्डवर्क’ का परिणाम है। वर्ष 2022 में, अपने डी.फिल (DPhil) शोध के दौरान, गुप्ता ने दिल्ली के प्रतिष्ठित निजी स्कूलों और हाशिए पर खड़े सरकारी स्कूलों में एक लंबा समय बिताया। उनका प्राथमिक उद्देश्य यह समझना था कि भारतीय कक्षाओं में ‘भाषा’ और ‘शर्म’ (Shame) का अंतर्संबंध छात्र के व्यक्तित्व को कैसे गढ़ता है।

अपने शोध के दौरान उन्हें एक ‘आकस्मिक खोज’ (incidental discovery) प्राप्त हुई। उन्होंने देखा कि कई स्कूल, विशेष रूप से 2014 के बाद के बदलते राजनीतिक माहौल में, अपनी छवि को “अधिक भारतीय” और “सांस्कृतिक रूप से गौरवशाली” दिखाने के लिए भाषाई प्रतीकों का एक व्यापक आडंबर रच रहे थे। चौंकाने वाली बात यह थी कि जहाँ एक ओर स्कूल के प्रवेश द्वार ‘हिंदी हैं हम’ के बैनरों से पटे थे, वहीं कक्षाओं के भीतर न तो हिंदी की गुणवत्ता पर ध्यान दिया जा रहा था और न ही छात्रों को अंग्रेजी में दक्ष बनाने के ठोस प्रयास हो रहे थे। मोहिनी गुप्ता ने इस दोहरेपन को ‘भाषा-वॉशिंग’ का नाम दिया। यह शब्द यह इंगित करता है कि कैसे भाषाई नीतियों का प्रयोग वास्तविक छात्र सशक्तिकरण के बजाय केवल संस्थागत ब्रांडिंग और राजनीतिक अनुकूलन के लिए किया जा रहा है।

📍 ‘ग्रीनवॉशिंग’ से ‘भाषा-वॉशिंग’ तक का सफर: पाखंड का समाजशास्त्र

‘भाषा-वॉशिंग’ शब्द का वैचारिक आधार ‘ग्रीनवॉशिंग’ (Greenwashing) में निहित है। इस शब्द को पहली बार 1986 में पर्यावरण कार्यकर्ता जय वेस्टरवेल्ड (Jay Westerveld) ने गढ़ा था। वेस्टरवेल्ड ने फिजी के एक होटल में देखा कि प्रशासन ने मेहमानों से ‘तौलिये का पुन: उपयोग’ करने का आग्रह करते हुए इसे एक बड़ा पर्यावरण संरक्षण अभियान बताया। वास्तविकता इसके विपरीत थी; होटल को पर्यावरण की चिंता नहीं थी, बल्कि वे धुलाई के भारी खर्च को कम करना चाहते थे। उन्होंने इसे ‘पर्यावरण प्रेम के नाम पर लागत में कटौती’ करार दिया।

इसी तर्क को जब हम शिक्षा के क्षेत्र में लागू करते हैं, तो ‘भाषा-वॉशिंग’ की तस्वीर साफ होने लगती है। जिस प्रकार कंपनियाँ खुद को ‘इको-फ्रेंडली’ दिखाकर अपनी कमियों को छिपाती हैं, ठीक उसी तरह कई स्कूल अब ‘भाषा-प्रेमी’ होने का ढोंग कर रहे हैं।

“भाषा-वॉशिंग वह प्रतीकात्मक वर्चस्व की प्रक्रिया है जिसमें शैक्षणिक संस्थान अपनी नीतियों और कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय भाषाओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का बाहरी प्रदर्शन करते हैं, ताकि वे राजनीतिक और सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप दिख सकें। यह अक्सर वास्तविक भाषाई गुणवत्ता, संसाधन आवंटन और पारदर्शी शिक्षण पद्धतियों के अभाव को छिपाने का एक उपकरण होता है।”

उदाहरण के लिए, कई स्कूल महंगे विदेशी भाषा पाठ्यक्रमों को हटाकर ‘संस्कृत’ या ‘शुद्ध हिंदी’ के अनिवार्य सत्र शुरू कर रहे हैं। प्रथम दृष्टया यह सराहनीय लग सकता है, लेकिन बारीकी से देखने पर पता चलता है कि यह कदम अक्सर योग्य अंग्रेजी शिक्षकों की कमी को छिपाने या दक्षिणपंथी अभिभावकों को आकर्षित करने की एक विपणन रणनीति (Marketing Strategy) मात्र है। यह ‘लागत में कटौती’ का भाषाई संस्करण है, जहाँ शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता कर उसे ‘राष्ट्रवाद’ का कवर दे दिया जाता है।

📍 स्कूलों में ‘भारतीयता’ का दिखावा या वास्तविकता?

वर्तमान में स्कूल प्रशासन “भारतीयता” के पीछे भाग रहे हैं, लेकिन क्या यह खोज वास्तविक है? यहाँ हमें ‘टोकनवाद’ (Tokenism) और ‘सशक्तिकरण’ के बीच की महीन रेखा को समझना होगा। स्कूलों में हिंदी पखवाड़ा मनाना, छात्रों को श्लोक रटाना या सुलेख प्रतियोगिताएं आयोजित करना क्या वास्तव में भाषाई प्रेम है?

हमें कुछ कठिन प्रश्न पूछने होंगे:

  • क्या छात्र को अपनी मातृभाषा में ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ (आलोचनात्मक सोच) विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, या उसे केवल रटी-रटाई पंक्तियों का प्रदर्शन करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है?
  • क्या स्कूल का पुस्तकालय वास्तव में आधुनिक भारतीय साहित्य से समृद्ध है, या वहां केवल पुरानी, बोझिल शब्दावली वाली किताबें धूल फांक रही हैं?
  • क्या यह ‘भारतीयता’ केवल मंच तक सीमित है ताकि स्कूल प्रशासन सरकारी निरीक्षणों और सोशल मीडिया रेटिंग्स में ‘संस्कारी’ सिद्ध हो सके?

वास्तविक सशक्तिकरण तब होता है जब भाषा छात्र के लिए अभिव्यक्ति का एक सहज माध्यम बने। ‘भाषा-वॉशिंग’ में भाषा को एक ‘बोझ’ या ‘सजावट’ की वस्तु बना दिया जाता है, जिससे छात्र का भाषा से जुड़ाव होने के बजाय उससे अलगाव (Alienation) होने लगता है।

📍 2014 के बाद का भाषाई परिदृश्य और ‘ट्रिकल-डाउन’ प्रभाव

वर्ष 2014 भारतीय राजनीति और सामाजिक विमर्श में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। केंद्र सरकार ने हिंदी और संस्कृत के प्रचार-प्रसार को अपनी राष्ट्रीय अस्मिता के एजेंडे में प्रमुखता से शामिल किया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 ने भी ‘मातृभाषा में शिक्षा’ को एक अनिवार्य तत्व के रूप में प्रस्तुत किया।

हालाँकि, किसी भी नीति का प्रभाव उसके कार्यान्वयन की मंशा पर निर्भर करता है। इस राजनीतिक बदलाव का जो ‘ट्रिकल-डाउन’ प्रभाव स्कूलों पर पड़ा, वह काफी हद तक ‘प्रशासनिक भय’ और ‘अवसरवाद’ से प्रेरित था। स्कूल प्रशासन ने महसूस किया कि यदि वे खुद को इस नई विचारधारा के साथ संरेखित (align) नहीं करते हैं, तो उन्हें मान्यता प्राप्त करने या सामाजिक स्वीकार्यता पाने में कठिनाई हो सकती है। इसके परिणामस्वरूप, स्कूलों ने रातों-रात अपनी शिक्षण पद्धतियों को बदलने के बजाय अपने ‘विजुअल ब्रांडिंग’ को बदल दिया। सरकारी निर्देशों का पालन करने के दबाव में, शिक्षा का उद्देश्य गौण हो गया और ‘अनुपालन’ (Compliance) प्राथमिक बन गया।

📍 ‘हिंदी हैं हम’: प्रतीकों की राजनीति का खोखलापन

हिंदी दिवस के अवसर पर अक्सर ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं जहाँ सैकड़ों छात्र स्कूल के मैदान में खड़े होकर मानव श्रृंखला के माध्यम से “हिंदी हैं हम” लिखते हैं। विडंबना देखिए कि ये दृश्य अक्सर उन राज्यों से भी आते हैं जहाँ की प्राथमिक भाषा हिंदी नहीं है, जैसे आंध्र प्रदेश या तमिलनाडु के कुछ निजी संस्थान।

ये दृश्य केवल सुंदर फोटो-अपॉर्च्युनिटी (Photo-opportunity) प्रदान करते हैं, लेकिन इनके पीछे की हकीकत भयावह है। जिस छात्र को “हिंदी” के ‘ह’ अक्षर की आकृति बनाने के लिए धूप में खड़ा किया गया है, हो सकता है कि वह कक्षा में हिंदी का एक सरल वाक्य बोलने में भी अक्षम हो। यह प्रतीकों की राजनीति है जो वास्तविक सीखने के परिणामों (Learning Outcomes) को पूरी तरह हाशिए पर धकेल देती है। जब भाषा को केवल प्रदर्शन (Performance) बना दिया जाता है, तो वह ज्ञान के संवर्धन के बजाय ‘राजनीतिक विज्ञापन’ बन कर रह जाती है।

📍 तुलनात्मक विश्लेषण: नीतिगत दावे बनाम ज़मीनी अनुभव

नीचे दी गई तालिका स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि स्कूलों द्वारा किए जा रहे दावों और छात्रों द्वारा महसूस की जा रही वास्तविकता के बीच कितना गहरा अंतर्द्वंद है:

विषय (Aspect)सरकारी/स्कूल का दावा (Stated Claim)वास्तविक अनुभव (Actual Experience)
हिंदी/संस्कृत का प्रचारसांस्कृतिक गौरव की पुनर्स्थापना और जड़ों से जुड़ावप्रतीकात्मक उत्सव, रटने की प्रवृत्ति और सतही दिखावा
मातृभाषा शिक्षाछात्र सशक्तिकरण और बेहतर समझअंग्रेजी और मातृभाषा के बीच का गहरा भ्रम
स्कूलों का रुख“भारतीयता” को समग्रता से अपनाना‘भाषा-वॉशिंग’ (राजनीतिक अनुकूलन के लिए छवि सुधार)
शिक्षक योग्यताविशेषज्ञों द्वारा भाषाई प्रशिक्षणगैर-प्रशिक्षित शिक्षकों द्वारा ‘कामचलाऊ’ अध्यापन

यह तालिका इस बात की पुष्टि करती है कि ‘सांस्कृतिक गौरव’ की आड़ में छात्रों के ऊपर एक अतिरिक्त भाषाई बोझ डाल दिया गया है, जिसकी परिणति न तो बेहतर हिंदी में हो रही है और न ही प्रभावी अंग्रेजी में।

📍 शर्म और भाषा का अंतर्संबंध: एक मानवीय त्रासदी

मोहिनी गुप्ता के अध्ययन का सबसे मार्मिक हिस्सा वह है जहाँ वे “शर्म” (Shame) की सूक्ष्म परतों को उधेड़ती हैं। दशकों तक भारतीय समाज में यह धारणा रही कि अंग्रेजी न बोल पाना ‘अयोग्यता’ और ‘पिछड़ेपन’ की निशानी है। यह ‘वर्ग-आधारित शर्म’ थी।

किंतु, ‘भाषा-वॉशिंग’ के इस दौर में एक नई और अधिक जटिल ‘दोहरी शर्म’ का उदय हुआ है। एक कक्षा के दृश्य की कल्पना कीजिए: एक छात्र जो घर में अपनी आंचलिक भाषा या ‘हिंदुस्तानी’ बोलता है, वह स्कूल के अंग्रेजी माध्यम के कारण वहां पहले से ही हिचकिचाहट महसूस करता है। अब, उस पर ‘शुद्ध हिंदी’ या ‘संस्कृत’ का राजनीतिक दबाव भी डाल दिया गया है। जब वह छात्र स्कूल के मंच पर खड़ा होता है और ‘भाषा-वॉशिंग’ की नीतियों के तहत उसे शुद्ध तत्सम शब्दों वाली हिंदी बोलने के लिए मजबूर किया जाता है, तो वह अपनी सामान्य भाषा के लिए भी शर्मिंदा होने लगता है।

छात्र एक त्रिकोणीय कशमकश में फंसा है:

  1. वैश्विक रोजगार और ‘स्टेटस’ के लिए उसे उच्च स्तरीय अंग्रेजी चाहिए।
  2. स्कूल के ‘भारतीयता’ के दिखावे के लिए उसे ‘सांस्कृतिक भाषा’ का भक्त दिखना है।
  3. उसकी अपनी सहज भाषा (जो वह घर पर बोलता है) को ‘अशुद्ध’ या ‘देहाती’ मानकर अपमानित किया जाता है।

यह भाषाई असुरक्षा छात्र के आत्मविश्वास को जड़ से हिला देती है। वह कहीं का नहीं रहता—न तो वह अंग्रेजी में अपने विचार रख पाता है और न ही थोपी गई ‘शुद्ध’ हिंदी में।

📍 क्या हम अंग्रेजी के साथ न्याय कर पा रहे हैं?

राजनीतिक विमर्श में अंग्रेजी को अक्सर “औपनिवेशिक दासता” का प्रतीक बताकर तिरस्कृत किया जाता है। लेकिन एक समाजशास्त्रीय शोधकर्ता के रूप में हमें यह स्वीकार करना होगा कि अंग्रेजी आज भी वैश्विक ज्ञान, उच्च तकनीक और आर्थिक सशक्तिकरण का सबसे सशक्त द्वार है।

‘भाषा-वॉशिंग’ का सबसे आत्मघाती पहलू यह है कि यह ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर अंग्रेजी शिक्षण की गुणवत्ता को गिरा रहा है, बिना हिंदी को प्रभावी ढंग से सिखाए। स्कूल प्रशासन संसाधनों को उन क्षेत्रों में मोड़ रहे हैं जो ‘दिखते’ अधिक भारतीय हैं, जबकि बुनियादी अंग्रेजी लैब और प्रशिक्षित शिक्षकों की अनदेखी की जा रही है। इसका परिणाम यह है कि छात्र अपनी प्रतिस्पर्धी क्षमता (Competitive Edge) खो रहे हैं। यह भाषाई अंधराष्ट्रवाद अंततः छात्रों के भविष्य के साथ एक बड़ा धोखा है।

📍 निजी बनाम सरकारी स्कूलों का भाषाई संघर्ष: वर्ग का विभाजन

मोहिनी गुप्ता ने पाया कि ‘भाषा-वॉशिंग’ का स्वरूप स्कूल की सामाजिक श्रेणी के आधार पर बदल जाता है:

  • निजी स्कूल (विशिष्ट वर्ग): यहाँ ‘भाषा-वॉशिंग’ एक ‘प्रीमियम ऐड-ऑन’ की तरह है। ये स्कूल अपनी कॉस्मोपॉलिटन और आधुनिक छवि को संतुलित करने के लिए हिंदी और संस्कृत का उपयोग एक ‘आभूषण’ की तरह करते हैं। यहाँ हिंदी केवल वार्षिक समारोहों या वाद-विवाद प्रतियोगिताओं का विषय है, जबकि वास्तविक सत्ता अंग्रेजी के पास ही रहती है। यह ‘लिबरल होने के साथ-साथ संस्कारी’ दिखने का एक रणनीतिक प्रयास है।
  • सरकारी और कम लागत वाले स्कूल: यहाँ दबाव अधिक प्रत्यक्ष और दमनकारी है। यहाँ भाषा का प्रयोग ‘प्रशासनिक अनुपालन’ (Administrative Compliance) का हिस्सा है। शिक्षकों को भय होता है कि यदि वे हिंदी या संस्कृत के आयोजनों में पीछे रहे, तो उनकी रिपोर्ट खराब हो सकती है। यहाँ संसाधनों की कमी को अक्सर ‘भाषाई गौरव’ के नारों के पीछे छिपा दिया जाता है।

यह विभाजन एक ‘भाषाई रंगभेद’ (Linguistic Apartheid) पैदा कर रहा है, जहाँ अमीर बच्चे अंग्रेजी की ताकत के साथ हिंदी का ‘ग्लैमर’ भी पाते हैं, जबकि गरीब बच्चे केवल प्रतीकों के खेल में उलझकर रह जाते हैं।

📍 दिखावे की राजनीति का छात्रों पर प्रभाव

‘भाषा-वॉशिंग’ के दूरगामी प्रभाव छात्रों के मानसिक और संज्ञानात्मक विकास के लिए चिंताजनक हैं:

  • 🆔 पहचान का संकट (Identity Crisis): छात्र यह तय नहीं कर पाते कि उनकी ‘प्रामाणिक’ आवाज कौन सी है। क्या वह वह छात्र है जो मंच पर “हिंदी हैं हम” का नारा लगाता है, या वह जो एकांत में अंग्रेजी न बोल पाने के कारण खुद को कमतर आंकता है?
  • 😟 भाषाई असुरक्षा (Linguistic Insecurity): किसी भी एक भाषा में पूर्ण अधिकार न होने के कारण छात्र अभिव्यक्ति के स्तर पर असुरक्षित महसूस करते हैं। यह असुरक्षा उन्हें सार्वजनिक विमर्श से बाहर कर देती है।
  • 📉 संज्ञानात्मक विकास में गिरावट (Reduction in Cognitive Development): शोध बताते हैं कि बच्चा तभी सबसे अच्छा सीखता है जब उसकी शिक्षा की भाषा और चिंतन की भाषा एक हो। ‘भाषा-वॉशिंग’ दिखावे के चक्र में इस बुनियादी सिद्धांत को नष्ट कर देती है, जिससे छात्रों की मौलिक सोच कुंठित हो जाती है।

📍 सशक्तिकरण की ओर: दिखावे से आगे का मार्ग

यदि हमें वास्तव में अपनी भाषाई विरासत को बचाना है, तो हमें ‘भाषा-वॉशिंग’ के पाखंड को छोड़कर वास्तविक सशक्तिकरण की ओर बढ़ना होगा:

  1. सहज मातृभाषा आधारित शिक्षा: इसका अर्थ है छात्र को उसकी अपनी बोली में सोचने, सवाल पूछने और ‘तर्क’ करने की आजादी देना। मातृभाषा केवल कविता पाठ के लिए नहीं, बल्कि विज्ञान और गणित समझने के लिए भी इस्तेमाल होनी चाहिए।
  2. भाषाई समावेशिता: अंग्रेजी को ‘दुश्मन’ मानने के बजाय उसे एक ‘अनिवार्य कौशल’ (Skill) के रूप में देखना और भारतीय भाषाओं को अपनी ‘अस्मिता’ (Identity) के रूप में सम्मान देना। दोनों के बीच कोई युद्ध नहीं होना चाहिए।
  3. शिक्षक प्रशिक्षण में निवेश: दिखावटी बैनरों पर खर्च करने के बजाय, स्कूलों को उन शिक्षकों पर निवेश करना चाहिए जो भाषा को जीवंत बना सकें, न कि उसे रटाने वाला एक और विषय।

📍 मेटाफर: भाषा एक पुल है, पर्दा नहीं

हमें यह समझना होगा कि भाषा एक पुल (Bridge) की तरह होनी चाहिए—एक ऐसा पुल जो छात्र को विश्व-ज्ञान, उसकी अपनी संस्कृति और उसके भीतर छिपे असीम विचारों से जोड़ता है। यह पुल तभी मजबूत होगा जब इसकी नींव ‘सच्चाई’ और ‘गुणवत्ता’ पर टिकी होगी।

वर्तमान में, ‘भाषा-वॉशिंग’ ने भाषा को एक पर्दे (Curtain) में बदल दिया है। इस भव्य और अलंकृत पर्दे के पीछे शिक्षा व्यवस्था की अपनी जर्जरता, योग्य शिक्षकों का अभाव, फटे हुए पुस्तकालय और संसाधनों की भीषण कमी को छिपा दिया गया है। जब तक हम इस चमकीले पर्दे को हटाकर इसके पीछे की कड़वी सच्चाई का सामना नहीं करेंगे, तब तक ‘भाषाई गौरव’ की हमारी तमाम बातें केवल खोखले नारे ही बनी रहेंगी।

📍 निष्कर्ष: भविष्य की भाषा

‘भाषा-वॉशिंग’ भारतीय शिक्षा व्यवस्था के समक्ष खड़ी एक ऐसी मूक चुनौती है, जिसे अक्सर हम ‘सांस्कृतिक पुनरुत्थान’ समझकर अनदेखा कर देते हैं। मोहिनी गुप्ता का शोध हमें आगाह करता है कि शिक्षा का उद्देश्य छात्र को ‘प्रतीक’ बनाना नहीं, बल्कि उसे ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) प्रदान करना है।

यदि हमारे स्कूल केवल राजनीतिक हवाओं के रुख को देखकर अपनी भाषा बदल रहे हैं, तो वे शिक्षा के साथ न्याय नहीं कर रहे। अंततः, हमें खुद से यह प्रश्न पूछना होगा: क्या हम ऐसी पीढ़ी तैयार करना चाहते हैं जो केवल “हिंदी हैं हम” का नारा लगा सके, या ऐसी पीढ़ी जो अपनी भाषा के आत्मविश्वास के साथ दुनिया की आँखों में आँखें डालकर अपनी बात कह सके? भाषा को गर्व का विषय होना चाहिए, राजनीतिक विज्ञापन का नहीं।

📍 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: भाषाई गर्व (Linguistic Pride) और ‘भाषा-वॉशिंग’ के बीच सूक्ष्म अंतर क्या है? उत्तर: भाषाई गौरव का अर्थ है अपनी भाषा की गहराई, उसके साहित्य और उसकी अभिव्यक्ति की क्षमता के प्रति वास्तविक सम्मान, जो छात्र को सशक्त बनाता है। इसके विपरीत, ‘भाषा-वॉशिंग’ एक ‘परफॉर्मेटिव’ क्रिया है। यह केवल बाहरी दिखावा है जहाँ भाषा का उपयोग छात्र की समझ बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि संस्थान की राजनीतिक और सामाजिक छवि को ‘नेशनलिस्ट’ या ‘कल्चरल’ दिखाने के लिए किया जाता है।

प्रश्न 2: ‘ग्रीनवॉशिंग’ की अवधारणा ने इस शोध को कैसे दिशा दी? उत्तर: जिस प्रकार कंपनियाँ खुद को पर्यावरण के अनुकूल दिखाने के लिए ‘ग्रीनवॉशिंग’ का सहारा लेती हैं ताकि वे अपनी प्रदूषणकारी गतिविधियों या लागत कटौती को छिपा सकें, ठीक वैसे ही स्कूल ‘भाषा-वॉशिंग’ का उपयोग करते हैं। मोहिनी गुप्ता ने इस समानता को पकड़ा कि कैसे भाषा का उपयोग शिक्षा की गुणवत्ता में कमी को छिपाने के लिए एक ‘कॉस्मेटिक कवर’ की तरह किया जा रहा है।

प्रश्न 3: मोहिनी गुप्ता के अध्ययन के लिए 2022 का समय इतना महत्वपूर्ण क्यों था? उत्तर: 2022 का समय इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के लागू होने के ठीक बाद का दौर था। इस समय देश में भाषाई राजनीति अपने चरम पर थी और स्कूलों पर केंद्र सरकार के ‘भारतीयकरण’ के एजेंडे को अपनाने का भारी दबाव था। यह समय इस बात के अध्ययन के लिए सटीक था कि नीतिगत बदलाव ज़मीनी स्तर पर कैसे ‘दिखावे’ में बदल रहे हैं।

प्रश्न 4: क्या ‘भाषा-वॉशिंग’ का प्रभाव केवल हिंदी भाषी क्षेत्रों तक सीमित है? उत्तर: बिल्कुल नहीं। यह प्रवृत्ति पूरे भारत में देखी जा रही है। गैर-हिंदी भाषी राज्यों में भी, निजी स्कूल राष्ट्रीय स्तर पर अपनी ‘स्वीकार्यता’ बढ़ाने के लिए हिंदी और संस्कृत के प्रतीकात्मक कार्यक्रमों का उपयोग कर रहे हैं। यह एक अखिल भारतीय घटना बन चुकी है जहाँ क्षेत्रीय पहचान और राष्ट्रीय पहचान के बीच स्कूलों का ‘दिखावा’ फंसा हुआ है।

प्रश्न 5: अभिभावक के तौर पर हम कैसे पहचानें कि हमारे बच्चे का स्कूल ‘भाषा-वॉशिंग’ कर रहा है? उत्तर: यदि स्कूल केवल ‘हिंदी दिवस’ या ‘संस्कृत सप्ताह’ जैसे आयोजनों पर बहुत भव्यता दिखाता है, लेकिन सामान्य दिनों में बच्चा यदि अपनी भाषा में बात करे तो उसे दंडित किया जाता है, या यदि स्कूल में अच्छी हिंदी की किताबें और योग्य भाषाई शिक्षक नहीं हैं, तो यह स्पष्ट रूप से ‘भाषा-वॉशिंग’ है। यदि भाषा का उपयोग केवल बैनरों और पोस्टरों तक सीमित है, तो सतर्क हो जाएं।

📍 महत्वपूर्ण संदर्भ और सरकारी निर्देश

भारतीय शिक्षा प्रणाली में भाषाई संक्रमण और ‘भाषा-वॉशिंग’ की जड़ों को समझने के लिए निम्नलिखित आधिकारिक दस्तावेजों का संदर्भ लिया जा सकता है:

  • विषय: शैक्षणिक संस्थानों में भारतीय भाषाओं (हिंदी और संस्कृत) का प्रोत्साहन और संवर्धन।
  • नीतिगत और सर्कुलर संदर्भ: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 / शिक्षा मंत्रालय के निर्देश (2014 के बाद की अवधि)। यह नीति प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा की वकालत करती है, लेकिन इसके ‘प्रतीकात्मक क्रियान्वयन’ ने ही ‘भाषा-वॉशिंग’ को जन्म दिया है।
  • संदर्भ लिंक: https://www.education.gov.in/nep-2020 (यह दस्तावेज उन सभी बदलावों का आधार है जिनका उल्लेख मोहिनी गुप्ता के शोध और इस लेख में किया गया है)।

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