1. प्रस्तावना: शिक्षा के क्षेत्र में एक नई क्रांति का आगाज़ 🏫
कल्पना कीजिए कि आप मुंबई के दादर या दिल्ली के चांदनी चौक जैसे घनी आबादी वाले इलाके में खड़े हैं। चारों तरफ ऊंची इमारतें, संकरी गलियां और लोगों का हुजूम। एक ‘एडुप्रेन्योर’ (Edupreneur) के तौर पर आपका सपना है कि आप इसी इलाके के बच्चों के लिए एक विश्वस्तरीय सीबीएसई (CBSE) स्कूल खोलें। लेकिन जैसे ही आप पुराने नियमों की किताब खोलते हैं, आपका उत्साह ठंडा पड़ जाता है। पुराने नियमों के अनुसार, इतने बड़े भूखंड (Land Plot) की जरूरत थी जो इन शहरों के दिल में मिलना लगभग नामुमकिन था। परिणाम? या तो स्कूल शहर से 20 किमी दूर खुलते थे या फिर खुल ही नहीं पाते थे।
लेकिन साल 2026 एक नई सुबह लेकर आया है। सीबीएसई ने जमीन की जरूरतों से जुड़े अपने बुनियादी नियमों में ऐसा ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ किया है, जिसने शिक्षा के रियल एस्टेट मॉडल को पूरी तरह से बदल दिया है। एक वरिष्ठ शिक्षा सलाहकार के रूप में, मैं इसे केवल एक नियम का बदलाव नहीं, बल्कि शिक्षा के लोकतान्त्रिकरण की दिशा में एक साहसिक कदम मानता हूँ। यह लेख उन सभी सपनों को पंख देने के लिए है जो जमीन की कमी के कारण अब तक दबे हुए थे। ‘CBSE Affiliation 2026’ केवल एक कीवर्ड नहीं, बल्कि एक निवेशक के लिए ‘रणनीतिक अवसर’ (Strategic Opportunity) है। आइए, इस बदलाव की गहराई में उतरते हैं।
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2. पुराने नियमों को विदाई: एफिलिएशन बाय-लॉज 2018 में क्या बदला? 🔄
शिक्षा जगत में किसी भी बड़े सुधार को समझने के लिए उसके इतिहास को जानना आवश्यक है। अब तक हम ‘सीबीएसई एफिलिएशन बाय-लॉज 2018’ के उन नियमों से बंधे थे, जो बदलते भारत की शहरी वास्तविकताओं से थोड़े दूर नज़र आ रहे थे। विशेष रूप से क्लॉज 3.3 से लेकर 3.7 तक ने जमीन की आवश्यकताओं को इतना जटिल बना दिया था कि एक आम निवेशक के लिए उसे समझना किसी टेढ़ी खीर से कम नहीं था।
गवर्निंग बॉडी का विजनरी फैसला: सीबीएसई की हालिया गवर्निंग बॉडी की बैठक में एक गंभीर विश्लेषण किया गया। यह पाया गया कि पुराने क्लॉज (3.3-3.7) स्थान-आधारित बाधाओं (Location-based constraints) से भरे हुए थे, जो अक्सर विरोधाभासी हो जाते थे। उदाहरण के लिए, किसी शहर के ‘नगर निगम’ की सीमा और ‘शहरी विकास प्राधिकरण’ की सीमा के बीच जमीन के नियमों में इतना अंतर था कि मान्यता प्रक्रिया वर्षों तक लटकी रहती थी।
बोर्ड ने इन जटिलताओं को जड़ से खत्म करते हुए इन सभी क्लॉज को निरस्त कर दिया है। इसकी जगह अब एक ‘यूनिफाइड लैंड चार्ट’ (Unified Land Chart) पेश किया गया है। एक सलाहकार के तौर पर मैं इसे ‘प्रशासनिक सुगमता’ (Administrative Ease) का सबसे बेहतरीन उदाहरण मानता हूँ। अब आपको वकीलों और तहसीलदारों के चक्कर काटकर यह साबित नहीं करना होगा कि आपकी जमीन किस तकनीकी श्रेणी में आती है; बस चार्ट देखिए और अपनी पात्रता सुनिश्चित कीजिए। यह पारदर्शिता भ्रष्टाचार को कम करने और ‘Ease of Doing Business’ को बढ़ावा देने में मील का पत्थर साबित होगी।
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3. कैटेगरी A: सामान्य क्षेत्रों में स्कूल खोलने की तैयारी 📏
सीबीएसई ने भारत की भौगोलिक बनावट को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है। सबसे पहली है ‘कैटेगरी A’, जिसे हम ‘सामान्य क्षेत्र’ (General Areas) कहते हैं।
कौन से इलाके आते हैं यहाँ? इसमें देश के वे हिस्से शामिल हैं जो न तो मेट्रो शहरों की श्रेणी में हैं, न ही राज्य की राजधानियों या पहाड़ी क्षेत्रों में। सरल भाषा में कहें तो ग्रामीण इलाके और छोटे कस्बे।
- सीनियर सेकेंडरी स्कूल (12वीं तक): इसके लिए अब 6000 वर्ग मीटर जमीन की अनिवार्यता रखी गई है।
विशेषज्ञ विश्लेषण और मौलिक राय: अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या 6000 वर्ग मीटर (लगभग 1.5 एकड़) ग्रामीण इलाकों के लिए ज्यादा नहीं है? मेरा जवाब है—नहीं। कैटेगरी A में जमीन की उपलब्धता तुलनात्मक रूप से आसान और सस्ती है। यहाँ सीबीएसई का उद्देश्य एक ‘विशाल कैंपस अनुभव’ (Large Campus Experience) प्रदान करना है।
एक स्कूल केवल चारदीवारी नहीं होता; वह एक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) है। 6000 वर्ग मीटर की जमीन पर आप न केवल कक्षाएं बना सकते हैं, बल्कि भविष्य के लिए ऑडिटोरियम, स्विमिंग पूल और विस्तृत प्रयोगशालाओं की योजना भी बना सकते हैं। जो निवेशक कैटेगरी A में निवेश कर रहे हैं, उन्हें मेरी सलाह है कि वे इसे ‘भविष्य का स्कूल’ (Future-proof School) मानें। यहाँ जमीन की कम लागत आपको एक ऐसा इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने की अनुमति देती है जो अगले 50 सालों तक प्रासंगिक बना रहे।
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4. कैटेगरी B: राजधानी और पहाड़ी इलाकों के लिए विशेष राहत 🏔️
जब हम राज्य की राजधानियों या नैनीताल और शिमला जैसे पहाड़ी इलाकों की बात करते हैं, तो चुनौती जमीन की कीमत से ज्यादा उसकी ‘उपलब्धता’ की होती है। पहाड़ों पर समतल जमीन मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं है।
कैटेगरी B का दायरा:
- सभी राज्यों की राजधानियाँ।
- ‘Y’ कैटेगरी के शहर: इसमें वे शहर शामिल हैं जिनकी आबादी और विकास का स्तर मध्यम से उच्च है (जैसे पुणे, अहमदाबाद, चंडीगढ़, जयपुर, लखनऊ, कोच्चि आदि)।
- भारत के सभी अधिसूचित पहाड़ी इलाके (Hilly Areas)।
जमीन की नई सीमाएं (New Land Limits):
- सेकेंडरी स्कूल (10वीं तक): मात्र 2400 वर्ग मीटर जमीन।
- सीनियर सेकेंडरी स्कूल (12वीं तक): मात्र 3200 वर्ग मीटर जमीन।
परामर्शदाता का दृष्टिकोण (Consultant’s View): यहाँ 3200 वर्ग मीटर का नियम एक गेम-चेंजर है। ‘Y’ श्रेणी के शहरों में जमीन की कीमतें प्रति वर्ग फुट हजारों में होती हैं। पहले जहाँ 4000-5000 मीटर की तलाश में स्कूल शहर से बाहर चले जाते थे, अब वे शहर के ‘प्राइम लोकेशंस’ पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं। इससे स्कूलों की ‘व्यावसायिक व्यवहार्यता’ (Commercial Viability) बढ़ जाती है क्योंकि छात्रों के लिए ट्रांसपोर्टेशन का खर्च कम हो जाता है और स्कूल की पहुंच मध्यम वर्गीय परिवारों तक आसान हो जाती है।
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5. कैटेगरी C: मेट्रो शहरों और सामरिक राज्यों के लिए 1600 मीटर का जादुई आंकड़ा 🏙️
अब बात करते हैं उस नियम की जिसने पूरे शिक्षा जगत में हलचल मचा दी है। कैटेगरी C को ‘क्रांतिकारी’ कहना गलत नहीं होगा।
कैटेगरी C के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र:
- ‘X’ कैटेगरी के मेट्रो शहर: दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई।
- सामरिक और भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण क्षेत्र: अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह।
नियम जो अब ‘वरदान’ हैं:
- सेकेंडरी स्कूल (10वीं तक): मात्र 1600 वर्ग मीटर जमीन।
- सीनियर सेकेंडरी स्कूल (12वीं तक): मात्र 2400 वर्ग मीटर जमीन।
मेट्रो शहरों के लिए जादुई आंकड़ा: मुंबई जैसे शहर में जहाँ एक फ्लैट की कीमत करोड़ों में है, वहाँ 1600 वर्ग मीटर में स्कूल खोलने की अनुमति देना किसी सपने जैसा है। यह नियम उन पुराने संस्थानों के लिए भी एक मौका है जो जगह की कमी के कारण सीबीएसई मान्यता नहीं ले पा रहे थे।
पूर्वोत्तर और द्वीपीय राज्यों का रणनीतिक महत्व: अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे राज्यों को कैटेगरी C में रखना सीबीएसई के ‘समावेशी दृष्टिकोण’ (Inclusive Approach) को दर्शाता है। इन दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षा के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास के लिए आवश्यक है। 1600-2400 मीटर की यह सीमा इन राज्यों में स्थानीय एडुप्रेन्योर्स को प्रोत्साहित करेगी कि वे अपने ही इलाके में अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा प्रदान करें।
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6. जमीन की आवश्यकताओं का तुलनात्मक विश्लेषण (Table) 📊
निवेशकों और स्कूल प्रबंधकों की सुविधा के लिए यहाँ एक विस्तृत तुलनात्मक चार्ट दिया गया है, जो ‘CBSE Affiliation 2026’ के जमीन मानकों को स्पष्ट करता है:
| श्रेणी (Category) | स्थान का प्रकार (Location Type) | सेकेंडरी स्कूल (10th) हेतु जमीन | सीनियर सेकेंडरी (12th) हेतु जमीन |
| कैटेगरी A | सामान्य इलाके (ग्रामीण/अर्ध-शहरी) | 6000 वर्ग मीटर (अनुशंसित) | 6000 वर्ग मीटर |
| कैटेगरी B | राज्य राजधानी, ‘Y’ श्रेणी शहर, पहाड़ी इलाके | 2400 वर्ग मीटर | 3200 वर्ग मीटर |
| कैटेगरी C | ‘X’ श्रेणी मेट्रो (दिल्ली, मुंबई आदि) व अरुणाचल, सिक्किम, अंडमान | 1600 वर्ग मीटर | 2400 वर्ग मीटर |
डेटा विश्लेषण: इस टेबल से स्पष्ट है कि सीबीएसई ने ‘एक नियम सबके लिए’ के पुराने ढर्रे को त्याग कर ‘स्थान-विशिष्ट’ (Location-specific) मॉडल अपनाया है। कैटेगरी A और कैटेगरी C के बीच जमीन की आवश्यकता में लगभग 73% का अंतर है। यह इस बात का प्रमाण है कि बोर्ड शहरी घनी आबादी और भौगोलिक विषमताओं को गहराई से समझता है। नए निवेशकों के लिए अब अपना बजट और लोकेशन चुनना गणितीय रूप से आसान हो गया है।
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7. खेल का मैदान (Play Area): कम जमीन पर भी बच्चों की सेहत से समझौता नहीं 🏟️
अक्सर यह आलोचना की जाती है कि जमीन कम होने से स्कूलों की गुणवत्ता गिरेगी और बच्चे ‘पिंजरों’ में पढ़ेंगे। सीबीएसई ने इस शंका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
सीबीएसई का कड़ा निर्देश: “भले ही कुल जमीन की आवश्यकता कम कर दी गई हो, लेकिन हर स्कूल के पास कैंपस के अंदर कम से कम 2000 वर्ग मीटर का समर्पित खेल का मैदान होना अनिवार्य है। बच्चों का शारीरिक विकास हमारी प्राथमिकता है, और जमीन की रियायत का मतलब खेल सुविधाओं में कटौती बिल्कुल नहीं है।”
यह एक बहुत ही संतुलित रुख है। बोर्ड का संदेश स्पष्ट है: यदि आपके पास मेट्रो शहर में कुल 2400 मीटर जमीन है, तो उसमें से 2000 मीटर खेल के लिए होना चाहिए, और बाकी 400 मीटर के ‘फुटप्रिंट’ पर आपकी इमारत खड़ी होनी चाहिए। यहीं से ‘वर्टिकल स्कूल’ की अवधारणा जन्म लेती है।
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8. 200 मीटर का दायरा और 15 साल का MOU: एक अभिनव समाधान 🤝
शहरी इलाकों में अगर कैंपस के भीतर 2000 मीटर का मैदान उपलब्ध न हो, तो क्या स्कूल नहीं खुलेगा? सीबीएसई ने यहाँ एक बहुत ही व्यावहारिक ‘सुरक्षा कवच’ प्रदान किया है।
MOU की शर्तें और सुरक्षा प्रोटोकॉल:
- सहयोग (Collaboration): स्कूल प्रबंधन पास के किसी खेल स्टेडियम, सरकारी पार्क या किसी निजी संस्था के मैदान का उपयोग कर सकता है।
- 15 साल का कानूनी बंधन: यह कोई मौखिक समझौता नहीं होगा। इसके लिए 15 साल का रजिस्टर्ड MOU अनिवार्य है। यह अवधि इसलिए चुनी गई है ताकि एक बच्चा जो नर्सरी में प्रवेश ले, वह 12वीं तक बिना किसी बाधा के खेल सुविधाओं का लाभ उठा सके।
- दूरी का गणित: वह बाहरी मैदान स्कूल से 200 मीटर के रेडियस के भीतर होना चाहिए।
- सुरक्षा की सख्त शर्त: बच्चों को स्कूल से मैदान तक जाने के लिए किसी राष्ट्रीय राजमार्ग (National Highway) या व्यस्त स्टेट हाईवे को पार न करना पड़े।
एक सुंदर रूपक (Metaphor): इसे इस तरह समझें कि स्कूल एक ‘हृदय’ (Hub) है जहाँ ज्ञान का संचार होता है, और वह पड़ोस का पार्क स्कूल के लिए ‘फेफड़ों’ (Lungs) का काम करता है। ये दोनों मिलकर एक संपूर्ण ‘शैक्षिक शरीर’ का निर्माण करते हैं। यह सामुदायिक संसाधनों के साझा उपयोग का एक बेहतरीन वैश्विक मॉडल है।
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9. मौजूदा स्कूलों पर असर: क्या पुरानी मान्यता को खतरा है? 🛡️
जब भी नए नियम आते हैं, मौजूदा स्कूल प्रबंधक घबरा जाते हैं। लेकिन यहाँ घबराने की कोई बात नहीं है।
- सुरक्षित विरासत (Grandfathering): जो स्कूल पहले से सीबीएसई से संबद्ध हैं और पुराने नियमों (2018 बाय-लॉज) के तहत मान्यता प्राप्त कर चुके हैं, वे सुरक्षित हैं। बोर्ड उन पर नई जमीन की शर्तें जबरन नहीं थोपेगा।
- अपग्रेडेशन का विकल्प: यदि कोई पुराना सेकेंडरी स्कूल अब सीनियर सेकेंडरी के लिए आवेदन करना चाहता है, तो उसे इन नए 2026 नियमों का लाभ मिल सकता है। यह उन स्कूलों के लिए वरदान है जो जगह की कमी के कारण 12वीं तक विस्तार नहीं कर पा रहे थे।
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10. सचिव हिमांशु गुप्ता का विजन: नए सर्कुलर के पीछे की सोच 📜
सीबीएसई के सचिव हिमांशु गुप्ता द्वारा जारी किया गया यह सर्कुलर शिक्षा विभाग की कार्यशैली में बदलाव का प्रतीक है। इसके पीछे की सोच ‘नियामक सुगमता’ (Regulatory Ease) है। सचिव का विजन स्पष्ट है: बोर्ड को एक ‘पुलिस’ की तरह डंडा चलाने के बजाय एक ‘सुविधा प्रदाता’ (Facilitator) की तरह काम करना चाहिए। जब नियम सरल और पारदर्शी होते हैं, तो भ्रष्टाचार के रास्ते बंद हो जाते हैं और केवल वे लोग आगे आते हैं जो वास्तव में शिक्षा में गुणवत्ता लाना चाहते हैं। यह सर्कुलर ‘शिक्षा के अधिकार’ (RTE) को शहरी झुग्गी-झोपड़ियों और संकरी गलियों तक ले जाने की एक बड़ी कोशिश है।
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11. शहरीकरण और शिक्षा: छोटे भूखंडों पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की चुनौती 🏢
क्या 1600 या 2400 वर्ग मीटर में एक विश्वस्तरीय स्कूल बन सकता है? एक सलाहकार के तौर पर मेरा जवाब है—निश्चित रूप से, लेकिन इसके लिए ‘वर्टिकल थिंकिंग’ (Vertical Thinking) की जरूरत है।
वर्टिकल स्कूलों का उदय (The Rise of Vertical Schools):
- स्मार्ट आर्किटेक्चर: जब क्षैतिज (Horizontal) फैलाव मुमकिन न हो, तो हमें ऊपर की ओर बढ़ना होगा। आधुनिक स्कूल अब ‘स्टिल्ट पार्किंग’ और बहुमंजिला इमारतों में लाइब्रेरी और लैब को व्यवस्थित कर रहे हैं।
- डिजाइन टिप्स: 1600 मीटर के स्कूल में आप रूफटॉप बास्केटबॉल कोर्ट या इनडोर जिम बना सकते हैं। प्रयोगशालाओं को ‘मल्टीपर्पज’ बनाया जा सकता है जहाँ एक ही स्थान पर भौतिकी और रसायन विज्ञान के प्रयोग किए जा सकें।
- सुरक्षा मानक (NBC Rules): कम जमीन पर स्कूल बनाते समय नेशनल बिल्डिंग कोड (NBC) के अग्नि सुरक्षा नियमों का पालन करना सबसे बड़ी चुनौती है। रैंप, फायर लिफ्ट और चौड़ी सीढ़ियों के बिना मान्यता मिलना नामुमकिन है।
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12. निवेशकों और एडुप्रेन्योर्स (Edupreneurs) के लिए नई संभावनाएं 🚀
यह बदलाव शिक्षा के क्षेत्र में ‘इन्वेस्टमेंट मॉडल’ को बदल देगा।
- CAPEX में भारी कमी: जमीन की जरूरत कम होने से शुरुआती पूंजी निवेश (Capital Expenditure) में 40% से 50% तक की कमी आ सकती है। इससे स्कूल का ‘ब्रेक-इवन’ (वह समय जब स्कूल मुनाफे में आता है) जल्दी हासिल किया जा सकेगा।
- किफायती शिक्षा: जब स्कूल की जमीन की लागत कम होगी, तो प्रबंधन पर बैंकों के कर्ज का बोझ कम होगा। इसका सीधा सकारात्मक असर छात्रों की फीस पर पड़ेगा। एक एडुप्रेन्योर के तौर पर आप कम फीस में बेहतर सुविधाएं देकर मार्केट में अपनी जगह बना सकते हैं।
- रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI): शहरी इलाकों में स्कूलों की मांग हमेशा बनी रहती है। कम जमीन पर बना एक हाई-टेक स्कूल निवेशकों को बेहतर ROI प्रदान कर सकता है।
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13. मान्यता प्रक्रिया 2026: एक कदम आगे की सोच 📝
नियम आसान हुए हैं, लेकिन सीबीएसई की ‘क्वालिटी चेक’ (Quality Check) प्रक्रिया अब और भी सख्त होने वाली है।
- डिजिटल अनुपालन: अब सभी दस्तावेज ऑनलाइन और जियो-टैगिंग के साथ जमा होते हैं। आपकी जमीन की बाउंड्री और खेल के मैदान की दूरी को सैटेलाइट के जरिए चेक किया जा सकता है।
- दस्तावेजों की शुचिता: जमीन के मालिकाना हक या 15 साल की लीज डीड (Lease Deed) में एक कोमा की भी गलती भारी पड़ सकती है। मेरी सलाह है कि आवेदन से पहले एक पेशेवर ‘लैंड ऑडिट’ जरूर करवाएं।
- शैक्षणिक मानकों से कोई समझौता नहीं: बोर्ड ने जमीन में छूट दी है, लेकिन लैब इक्विपमेंट, लाइब्रेरी की किताबों और शिक्षकों के वेतन (Pay Scale) में कोई ढील नहीं दी है।
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14. भौगोलिक विविधता और सीबीएसई का संतुलित दृष्टिकोण 🌏
भारत जैसा देश जहाँ एक तरफ रेगिस्तान है और दूसरी तरफ घने जंगल, वहाँ एक ही नियम लागू करना नाइंसाफी थी। सीबीएसई ने अंडमान-निकोबार और सिक्किम जैसे राज्यों को कैटेगरी C में रखकर अपनी संवेदनशीलता दिखाई है। यह उन क्षेत्रों में ‘शिक्षा पलायन’ (Educational Migration) को रोकेगा। जब बच्चे को अपने ही द्वीप या पहाड़ पर सीबीएसई स्कूल मिलेगा, तो उसे पढ़ाई के लिए बड़े शहरों में भटकना नहीं पड़ेगा। यह ‘स्थानीय प्रतिभा’ (Local Talent) को तराशने की दिशा में एक बड़ा रणनीतिक कदम है।
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15. निष्कर्ष: सपनों के स्कूल की ओर बढ़ता कदम ✨
सीबीएसई द्वारा 2026 के लिए किए गए ये बदलाव केवल एक सर्कुलर नहीं, बल्कि भविष्य के भारत का ब्लूप्रिंट हैं। यह उन हजारों एडुप्रेन्योर्स के लिए एक न्योता है जो शिक्षा को एक नई ऊंचाई पर ले जाना चाहते हैं। अब जमीन की कमी आपके जुनून के आड़े नहीं आएगी। चाहे आप मुंबई की किसी व्यस्त सड़क पर हों या अरुणाचल की शांत पहाड़ियों पर, आप एक ‘शिक्षा का मंदिर’ खड़ा कर सकते हैं।
सोचिए: क्या यह नया नियम भारत के हर छोटे-बड़े मोहल्ले में एक उच्च स्तरीय सीबीएसई स्कूल के सपने को सच करने की ताकत रखता है? क्या आप इस बदलाव का हिस्सा बनने के लिए तैयार हैं? याद रखिए, शिक्षा में निवेश करना केवल धन का निवेश नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भाग्य का निर्माण करना है।
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16. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) ❓
प्रश्न 1: खेल के मैदान के लिए 15 साल का MOU क्या अनिवार्य है? क्या इसे कम किया जा सकता है? उत्तर: जी नहीं, इसे कम नहीं किया जा सकता। 15 साल की अवधि अनिवार्य है क्योंकि सीबीएसई यह सुनिश्चित करना चाहता है कि स्कूल की पूरी अवधि के दौरान छात्रों के पास खेल की सुविधा बनी रहे। यह कानूनी रूप से रजिस्टर्ड दस्तावेज होना चाहिए।
प्रश्न 2: मैं पुणे में स्कूल खोलना चाहता हूँ, यह किस कैटेगरी में आएगा? उत्तर: पुणे एक ‘Y’ कैटेगरी का शहर है, इसलिए यह कैटेगरी B के अंतर्गत आएगा। यहाँ आपको सीनियर सेकेंडरी स्कूल (12वीं) के लिए 3200 वर्ग मीटर जमीन की आवश्यकता होगी।
प्रश्न 3: क्या 1600 वर्ग मीटर में स्कूल खोलने पर क्या सीबीएसई की गुणवत्ता रेटिंग पर असर पड़ेगा? उत्तर: बिल्कुल नहीं। सीबीएसई जमीन की मात्रा नहीं, बल्कि सुविधाओं और शिक्षण की गुणवत्ता को देखता है। यदि आप 1600 मीटर में अत्याधुनिक लैब और स्मार्ट क्लासेज प्रदान करते हैं, तो आपकी रेटिंग शीर्ष पर रह सकती है।
प्रश्न 4: 200 मीटर की दूरी का आकलन कैसे किया जाएगा? उत्तर: यह दूरी स्कूल के मुख्य गेट से खेल के मैदान के गेट तक की ‘पैदल दूरी’ (Walking distance) के आधार पर मापी जाएगी। इसमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि रास्ते में कोई बड़ा नेशनल या स्टेट हाईवे न हो।
प्रश्न 5: क्या ग्रामीण क्षेत्रों में भी 1600 मीटर का नियम लागू हो सकता है? उत्तर: नहीं, ग्रामीण क्षेत्र कैटेगरी A (General Areas) में आते हैं। वहाँ सीनियर सेकेंडरी के लिए 6000 वर्ग मीटर जमीन अनिवार्य है क्योंकि बोर्ड वहां जमीन की प्रचुरता के कारण बच्चों के लिए बड़े खुले मैदान सुनिश्चित करना चाहता है।

