भाषा सीखने का नया अंदाज़: डॉ. अविनाशा शर्मा के साथ AI और शिक्षा में बदलाव की एक कहानी

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में अंग्रेजी केवल एक भाषा नहीं है; यह एक सामाजिक मापदंड, एक आत्मविश्वास का पैमाना और कभी-कभी तो एक अदृश्य डर बन जाती है। हमारी कक्षाओं में बैठा एक बड़ा तबका इस भाषा से इसलिए नहीं कतराता कि उसे व्याकरण नहीं आता, बल्कि इसलिए क्योंकि उसे ‘जज’ किए जाने का डर होता है। इस संकोच की दीवार को ढहाने और शिक्षा में तकनीक के साथ संवेदना को जोड़ने का एक अद्भुत प्रयास सीबीएसई (CBSE) के हालिया पॉडकास्ट में देखने को मिला। 🌟

इस संवाद की केंद्र बिंदु रहीं डॉ. अविनाशा शर्मा, जो एक वरिष्ठ अंग्रेजी लेक्चरर और शिक्षाविद हैं। उन्होंने अपने नवाचारों से यह साबित कर दिया है कि जब एक शिक्षक ‘बैकस्टेज’ खड़ा होकर छात्र को सहारा देता है, तो वह छात्र न केवल भाषा सीखता है, बल्कि अपना व्यक्तित्व भी निखारता है। आज के इस विस्तृत लेख में, हम डॉ. शर्मा के उन विचारों की गहराई में उतरेंगे जो भारतीय शिक्षा व्यवस्था में ‘अंकों की होड़’ से आगे बढ़कर ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ की बात करते हैं। 🎓

एक साधारण शिक्षिका से प्रेरक मार्गदर्शक तक: ‘गोल्ड’ की तलाश

डॉ. अविनाशा शर्मा की यात्रा लगभग डेढ़ दशक पहले शुरू हुई थी। शुरुआत में उन्होंने निजी स्कूलों के उन बच्चों को पढ़ाया जिनके पास दुनिया भर के संसाधन और एक्सपोजर मौजूद थे। लेकिन उनकी यात्रा का सबसे निर्णायक मोड़ तब आया जब उन्होंने वंचित वर्ग (underprivileged) के बच्चों के साथ काम करना शुरू किया। उन्होंने एक बहुत ही मर्मस्पर्शी बात कही कि इन बच्चों के लिए, शिक्षक ही उनकी दूसरी भाषा (अंग्रेजी) का एकमात्र ‘घर’ होता है। घर पर उनके पास ऐसा माहौल नहीं है जहाँ वे अंग्रेजी सुन सकें या बोल सकें, इसलिए स्कूल का वह कमरा ही उनका पूरा संसार बन जाता है। 🏠✨

अक्सर लोग संसाधनों की कमी का रोना रोते हैं, लेकिन डॉ. शर्मा ने सरकारी स्कूल के सेटअप में ही ‘बेस्ट आउट ऑफ वेस्ट’ (Best out of Waste) के सिद्धांत को अपनाया। उन्होंने कबाड़ समझी जाने वाली चीज़ों से ऐसी भाषा प्रयोगशालाएं (Language Labs) खड़ी कर दीं, जिन्हें वे आज ‘गोल्ड’ (सोना) कहती हैं। यह बदलाव केवल भौतिक नहीं था; यह उन बच्चों की आंखों में जगी जिज्ञासा और रचनात्मकता का परिणाम था, जिन्हें समाज ने अक्सर पीछे छोड़ दिया था। उन्होंने महसूस किया कि एक शिक्षक का काम केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि छात्र के भीतर उस आकर्षण को पैदा करना है कि वह खुद भाषा की ओर खिंचा चला आए।

शिक्षण की नई परिभाषा: जब शिक्षक ‘बैकस्टेज’ जाता है

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और सीबीएसई के नए ढांचे ने शिक्षक की भूमिका को फिर से परिभाषित किया है। डॉ. शर्मा के अनुसार, अब शिक्षक एक ‘इंस्ट्रक्टर’ (अनुशासक) नहीं, बल्कि एक ‘फैसिलिटेटर’ (सुविधाप्रदाता) है। आज की ‘जेन-जी’ (Gen-Z) के लिए जानकारी की कोई कमी नहीं है। गूगल और चैट-जीपीटी (ChatGPT) किसी भी पाठ का सारांश सेकंडों में दे सकते हैं। ऐसी स्थिति में शिक्षक की प्रासंगिकता क्या है? 🤝

यहाँ डॉ. शर्मा एक बहुत ही गहरा रूपक (metaphor) साझा करती हैं—“वेसल (पात्र) का ऑब्जर्विंग मोड में होना।” उनका मानना है कि जब तक छात्र का मस्तिष्क (पात्र) ग्रहण करने की स्थिति में नहीं होगा, आप उसमें कितना भी ज्ञान उड़ेल लें, वह बाहर ही गिरेगा। शिक्षक का काम उस पात्र को तैयार करना है। शिक्षक को कक्षा में वह वातावरण बनाना होता है जिसे AI घर पर कभी नहीं दे सकता—जैसे कि मानवीय जुड़ाव, सहानुभूति और सामूहिक सृजन। डॉ. शर्मा खुद को एक ‘ऑब्जर्वर’ मानती हैं जो छात्रों को खुद रास्ता खोजने देती हैं और ज़रूरत पड़ने पर ‘बैकस्टेज’ से सहारा देती हैं ताकि छात्र मंच पर चमक सकें।

अंग्रेजी का डर: ४० बच्चों के सामने खामोश होती आवाज़ें

क्या आपने कभी सोचा है कि एक बच्चा कक्षा में हाथ उठाने से क्यों डरता है? डॉ. शर्मा कहती हैं कि यह डर आज का नहीं है; यह दशकों से चला आ रहा ‘जज किए जाने का डर’ (Fear of being judged) है। जब एक शिक्षक ४० बच्चों के सामने किसी छात्र की उच्चारण की गलती पकड़ता है, तो वह केवल एक शब्द नहीं सुधार रहा होता, बल्कि वह उस बच्चे के आत्मविश्वास को एक गहरी चोट पहुँचा रहा होता है। 🚫😟

डॉ. शर्मा ने अपने स्कूली दिनों को याद करते हुए बताया कि तकनीक और युग बदल गए, पर यह डर नहीं बदला। छात्र को हमेशा यह चिंता रहती है कि “अगर मैंने गलत अंग्रेजी बोली, तो लोग मुझ पर हँसेंगे।” इसी मनोवैज्ञानिक अवरोध को तोड़ने के लिए उन्होंने तकनीक का सहारा लिया, लेकिन एक बहुत ही मानवीय और संवेदनशील तरीके से।

भाषा प्रयोगशाला (Language Lab): बिना शोर के आत्मविश्वास का निर्माण

डॉ. शर्मा द्वारा विकसित ‘लो-कॉस्ट लैंग्वेज लैब’ किसी भी स्कूल के लिए एक मॉडल बन सकती है। इसकी खासियत इसकी जटिलता नहीं, बल्कि इसकी सादगी है। इस लैब का मनोवैज्ञानिक प्रभाव बहुत गहरा है:

  • निजी और सुरक्षित संवाद: हर छात्र के पास एक हेडफोन और माइक होता है, जो सीधे शिक्षक के मास्टर कंसोल से जुड़ा होता है। जब छात्र को कोई समस्या होती है, तो वह एक बटन दबाता है।
  • गोपनीयता का सुख: शिक्षक और छात्र के बीच ‘वन-टू-वन’ बातचीत होती है। बाकी कक्षा को यह पता ही नहीं चलता कि कौन कहाँ अटक रहा है या किसे उच्चारण में दिक्कत हो रही है।
  • डर का खात्मा: छात्र को लगता है कि “सिर्फ मैं और मेरे शिक्षक ही बात कर रहे हैं।” यह अहसास उसे बिना किसी शर्मिंदगी के अपनी गलतियाँ सुधारने और बार-बार पूछने की आज़ादी देता है। 🎧💻

यह लैब केवल एक तकनीकी सेटअप नहीं है, बल्कि एक ‘सेफ स्पेस’ (सुरक्षित स्थान) है जहाँ छात्र को अपनी कमियों के साथ स्वीकार किया जाता है।

तुलनात्मक विश्लेषण: पारंपरिक बनाम आधुनिक भाषा शिक्षण

डॉ. अविनाशा शर्मा के क्रांतिकारी दृष्टिकोण और पारंपरिक शिक्षा पद्धति के बीच के अंतर को समझना ज़रूरी है। नीचे दी गई तालिका इस बदलाव को स्पष्ट करती है:

शिक्षण का आयामपारंपरिक दृष्टिकोणडॉ. शर्मा का आधुनिक दृष्टिकोणमनोवैज्ञानिक प्रभाव
शिक्षण का तरीकाव्याख्यान आधारित (Lecture Based)गतिविधि और अनुभव आधारितछात्र जुड़ाव महसूस करता है
तकनीक का उपयोगकेवल ब्लैकबोर्ड या प्रोजेक्टरAI, स्काइप और कस्टमाइज्ड लैबसीखने की प्रक्रिया रोमांचक बनती है
छात्र की भूमिकानिष्क्रिय श्रोता (Passive Listener)सक्रिय निर्माता और अन्वेषकआत्मविश्वास में वृद्धि
मूल्यांकन का आधारअंक और व्याकरण की शुद्धताअभिव्यक्ति और संचार की स्पष्टतागलती करने का डर खत्म होता है
शिक्षक की भूमिकाज्ञान का एकमात्र स्रोत (Authority)मार्गदर्शक और बैकस्टेज सपोर्टछात्र स्वतंत्र सोचना सीखता है

वैश्विक क्षितिज: जब कोलंबिया यूनिवर्सिटी से जुड़ी कक्षा

डॉ. शर्मा ने अपनी कक्षा की दीवारों को तकनीक के ज़रिए तोड़ दिया। उन्होंने Microsoft Skype के माध्यम से अपने छात्रों की बातचीत कोलंबिया यूनिवर्सिटी (Columbia University) के छात्रों से करवाई। यह केवल एक वीडियो कॉल नहीं थी, बल्कि एक ‘आंखें खोलने वाला’ अनुभव था। 🌍✈️

जब भारतीय छात्रों ने देखा कि विदेशी छात्र भी बोलते समय व्याकरण (Grammar) में अटक रहे हैं या सही शब्द ढूंढने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो उनके मन से अंग्रेजी का हौवा खत्म हो गया। बच्चों ने खुशी से चिल्लाकर कहा, “मैम, ये विदेशी भी हमारी तरह ही गलतियाँ करते हैं!” यही वह ‘अहा!’ मोमेंट था जिसने उन्हें सिखाया कि भाषा केवल परफेक्शन (पूर्णता) के लिए नहीं, बल्कि एक्सप्रेशन (अभिव्यक्ति) के लिए होती है। जैसे ही पूर्णता का बोझ उतरा, अभिव्यक्ति की धारा बह निकली।

अभिव्यक्ति बनाम व्याकरण: संचार की पहली शर्त

अक्सर हमारे समाज में अच्छी अंग्रेजी का मतलब ‘बिना गलती वाला व्याकरण’ मान लिया जाता है। डॉ. शर्मा इस धारणा को सिरे से खारिज करती हैं। वे कहती हैं कि व्याकरण और सिंटैक्स को ‘बैक सीट’ (पीछे की सीट) पर बैठने दें। सबसे पहले बच्चे को कम्युनिकेबल (संवाद करने योग्य) बनने दें। 🗣️✨

यदि कोई बच्चा अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर सामने वाले तक पहुँचा पा रहा है, तो भाषा का प्राथमिक उद्देश्य सफल हो गया। व्याकरण तो अभ्यास के साथ समय के साथ सुधरता रहेगा। डॉ. शर्मा सलाह देती हैं कि ग्लोबल इंटरव्यू या अंतरराष्ट्रीय मंचों की तैयारी करते समय अपनी स्पष्टता पर ध्यान दें, न कि इस बात पर कि आपकी वर्ब की फॉर्म सही थी या नहीं।

लेखन कला को निखारने का ५-चरणीय फॉर्मूला

लेखन एक ऐसी कला है जिसे अक्सर रटने के साथ जोड़ दिया जाता है। डॉ. शर्मा ने अपनी पुस्तक “Learn How to Write in 90 Days” में एक वैज्ञानिक और सृजनात्मक प्रक्रिया साझा की है। उनका विशेष ध्यान उन छात्रों पर है जो कक्षा १२ के बाद विदेश (जैसे कनाडा) जाने का सपना देखते हैं और जिन्हें रिसर्च राइटिंग (शोध लेखन) की ज़रूरत होती है। 📝📘

उन्होंने लेखन को ५ सरल और प्रभावी चरणों में विभाजित किया है:

  • सोचना (Thinking): सबसे पहले दिमाग में विचारों का मंथन (Churning) होने दें। जो भी विचार आए, उसे आने दें, उसे रोकें नहीं।
  • कागज पर उतारना (Putting on Paper): यहाँ व्याकरण या स्पेलिंग की चिंता न करें। बस अपने विचारों के प्रवाह को कागज पर लिख लें।
  • स्कीमिंग (Skimming): लिखे हुए को दोबारा पढ़ें और देखें कि क्या अप्रासंगिक है। फालतू बातों को हटा दें और मुख्य बिंदुओं को बचाएं।
  • व्यवस्थित करना (Organizing): अब उन विचारों को एक क्रम दें। कौन सी बात पहले आएगी, कौन सा तर्क बाद में—यह एक कहानी बुनने जैसा है।
  • सुंदर बनाना (Beautifying): सबसे अंत में अलंकारों, मुहावरों और सही शब्दावली का उपयोग करके अपनी रचना को ‘पॉलिश’ करें।

यह प्रक्रिया छात्रों को सिखाती है कि लेखन कोई बोझ नहीं, बल्कि अपनी कल्पना को आकार देने का एक सुंदर माध्यम है।

कक्षा में रचनात्मकता: ‘द हैप्पी प्रिंस’ और सुपरहीरो की दुनिया

डॉ. शर्मा की कक्षा में साहित्य केवल पन्नों पर नहीं रहता, वह जीवंत हो उठता है। जब उन्हें ऑस्कर वाइल्ड का नाटक ‘द हैप्पी प्रिंस’ पढ़ाना था, तो उन्होंने पारंपरिक व्याख्यान के बजाय छात्रों से खुद स्क्रिप्ट लिखवाई और नाटक का मंचन करवाया। 🎭🦸‍♂️

इसी तरह, उन्होंने ‘ए डे इन द लाइफ ऑफ अ सुपरहीरो’ जैसी गतिविधियाँ करवाईं। यहाँ शिक्षक की भूमिका केवल एक दर्शक की थी, जबकि छात्रों ने अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाए। डॉ. शर्मा का मानना है कि आज के बच्चे ‘कंटेंपररी’ (समकालीन) विषयों पर ज़्यादा अच्छा लिख सकते हैं। हमें उन्हें उनके युग की भाषा में व्यक्त होने की आज़ादी देनी चाहिए। जब छात्र खुद कुछ सृजित करता है, तो वह ज्ञान उसके साथ ताउम्र रहता है।

AI: आपका सारथी, सारथी नहीं (Your Tool, Not Your Driver)

आज के दौर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को लेकर शिक्षकों और छात्रों में एक अजीब सी दुविधा है। डॉ. शर्मा का इस पर दृष्टिकोण बहुत स्पष्ट और ‘थॉट लीडर’ वाला है। वे कहती हैं कि AI एल्गोरिदम पर आधारित है, जबकि मानव मस्तिष्क उस ‘सर्वशक्तिमान’ की एक अनूठी रचना है। 🤖🧠

वे अपनी कक्षा में समझाती हैं कि:

  • AI एक सपोर्टिव टूल है: यह आपको जानकारी (Information) दे सकता है, कंटेंट को छोटा (Concise) कर सकता है, लेकिन यह वह ‘क्रिएटिव एलिमेंट’ नहीं ला सकता जो आपके अनुभव से आता है।
  • Front-Seat Driver न बनने दें: AI को अपनी पॉलिशिंग के लिए इस्तेमाल करें, अपनी मौलिकता (Originality) को उसके हाथों में न सौंपें।
  • यूनिकनेस (विशिष्टता): AI वही देता है जो पहले से मौजूद है, जबकि एक बच्चा वह सोच सकता है जो आज तक नहीं सोचा गया। तकनीक का उपयोग अपनी चमक बढ़ाने के लिए करें, अपनी पहचान मिटाने के लिए नहीं।

अभिभावकों के लिए विशेष संदेश: बाधक नहीं, संरक्षक बनें

अभिभावकों की भूमिका पर डॉ. शर्मा के विचार हर माता-पिता को गौर से सुनने चाहिए। वे कहती हैं कि माता-पिता को ‘ऑब्स्ट्रक्टर’ (बाधक) के बजाय ‘गार्जियन’ (संरक्षक) बनना चाहिए।

आजकल के बच्चों का शेड्यूल देखकर वे चिंतित होती हैं—”स्कूल के बाद चेस क्लास, फिर पर्सनालिटी डेवलपमेंट क्लास, फिर इंग्लिश स्पीकिंग क्लास… आखिर वह बच्चा कहाँ है?” अभिभावकों को अपने सपनों का बोझ बच्चों पर लादने से बचना चाहिए। डॉ. शर्मा के कुछ सुझाव यहाँ दिए गए हैं:

  • अभिव्यक्ति का सम्मान करें: यदि आपका बच्चा हिंदी या अपनी मातृभाषा में भी कोई बढ़िया बात कह रहा है, तो उसकी प्रशंसा करें। भाषा तो अभिव्यक्ति के पीछे-पीछे चलती है।
  • डाइनिंग टेबल संवाद: घर के खाने की मेज पर बच्चों के साथ सहज बातचीत करें। उनसे उनके दिन के बारे में पूछें, उन्हें अपने बचपन की कहानियाँ सुनाएँ।
  • तुलना से बचें: “शर्मा जी का लड़का इतनी अच्छी अंग्रेजी बोलता है, तुम क्यों नहीं?”—यह वाक्य एक बच्चे की सीखने की क्षमता को मार देता है।
  • सुरक्षित माहौल दें: बच्चे को घर पर ऐसा वातावरण दें जहाँ वह बिना किसी डर के अपने विचार रख सके, चाहे वे विचार ‘अप टू द मार्क’ हों या नहीं। 👨‍👩‍👧‍👦

शब्दावली का संकट: ‘GY’ से ‘बौद्धिक संवाद’ तक

शिक्षकों के सामने आज एक बड़ी चुनौती है—सोशल मीडिया स्लैंग्स। डॉ. शर्मा ने हंसते हुए बताया कि बच्चे अपनी उत्तर पुस्तिकाओं में ‘Guys’ की जगह ‘GY’ लिख रहे हैं। यह बदलती शब्दावली का संकेत है।

वे कहती हैं कि हमें बच्चों को ‘हैप्पी वर्ड्स’ (सामान्य शब्द) और ‘इंटेलेक्चुअल वर्ड्स’ (बौद्धिक शब्द) के बीच का फर्क समझाना होगा। स्लैंग्स उनकी दुनिया का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन एक गंभीर संवाद के लिए उन्हें समृद्ध शब्दावली की आवश्यकता होती है। इसके लिए घर और स्कूल दोनों जगह कहानियों और अर्थपूर्ण चर्चाओं का माहौल बनाना ज़रूरी है। 📖🗣️

भविष्य की तैयारी: समग्र विकास के स्तंभ

डॉ. अविनाशा शर्मा के अनुसार, आने वाले ५ वर्षों में एक सफल छात्र वह होगा जो केवल परीक्षाओं में सफल न हो, बल्कि समाज के लिए एक ‘संसाधन’ (Resource) बने। इसके लिए कुछ प्रमुख कौशलों पर ध्यान देना अनिवार्य है:

कौशलमहत्व और छात्र पर प्रभाव
सुनने का कौशल (Listening)जानकारी को गहराई से समझने और आत्मसात करने की क्षमता।
पढ़ने की रुचि (Reading)नई शब्दावली और दुनिया के प्रति अलग दृष्टिकोण विकसित करना।
निर्भीक अभिव्यक्ति (Expression)अपने विचारों को स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ साझा करना।
अनुकूलनशीलता (Adaptability)तकनीक (AI) और बदलते परिवेश के साथ कदम से कदम मिलाना।
मूल्य आधारित शिक्षा (Values)चुनौतियों को उपहार समझना और समाज के प्रति जिम्मेदार होना।

इन कौशलों का मेल ही छात्र का ‘होलिस्टिक डेवलपमेंट’ (सर्वांगीण विकास) सुनिश्चित करता है। 🌟

निष्कर्ष: अंकों की होड़ नहीं, व्यक्तित्व की जीत

डॉ. अविनाशा शर्मा की पूरी चर्चा का लब्बोलुआब यह है कि हमें ‘प्रोडक्ट’ (अंकों) के बजाय ‘प्रोसेस’ (सीखने की प्रक्रिया) पर भरोसा करना चाहिए। जब सीखने की प्रक्रिया आनंददायक और भयमुक्त होती है, तो अंक एक बाई-प्रोडक्ट (सह-उत्पाद) के रूप में खुद-ब-खुद आ जाते हैं।

शिक्षा का असली मकसद छात्र को केवल ‘अच्छा’ बनाना नहीं, बल्कि उसे ‘सहज’ (Comfortable) बनाना है। जब एक बच्चा अपनी भाषा में, अपनी सोच में और अपनी पहचान में सहज महसूस करता है, तो वह दुनिया जीतने के लिए तैयार हो जाता है। आइए, हम सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाएं जहाँ बच्चों की आवाज़ें दबे नहीं, बल्कि निखरें। 🌈✨

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  • क्या एक साधारण शिक्षक भी बिना बड़े बजट के लैंग्वेज लैब बना सकता है? बिल्कुल। डॉ. शर्मा ने स्वयं ‘लो-कॉस्ट’ सेटअप का उदाहरण पेश किया है। इसके लिए केवल कुछ हेडफोन्स, माइक और एक बेसिक कंसोल की आवश्यकता होती है। मुख्य बात तकनीक नहीं, बल्कि वह शिक्षण पद्धति है जो छात्र को एकांत में शिक्षक से जुड़ने का मौका देती है।
  • अगर कोई बच्चा अंग्रेजी बोलने में बहुत हिचकिचाता है, तो पहला कदम क्या होना चाहिए? सबसे पहले उसके मन से ‘जज’ किए जाने का डर निकालें। उसे व्याकरण की चिंता किए बिना बोलने के लिए प्रोत्साहित करें। उसे यह समझाएं कि भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है, पूर्णता का नहीं। जैसे ही उसका आत्मविश्वास बढ़ेगा, भाषा खुद-ब-खुद सुधरने लगेगी।
  • लेखन कौशल को सुधारने के लिए डॉ. शर्मा का क्या सुझाव है? डॉ. शर्मा का ५-चरणीय फॉर्मूला अपनाएं: पहले स्वतंत्र होकर सोचें, फिर उसे कागज पर उतारें, उसके बाद अनावश्यक अंशों को हटाएं (स्कीमिंग), फिर उसे क्रम दें (ऑर्गनाइजिंग) और अंत में अलंकारों से सजाएं।
  • AI के दौर में शिक्षकों की भूमिका कैसे बदल गई है? शिक्षक अब जानकारी देने वाले नहीं, बल्कि ‘फैसिलिटेटर’ बन गए हैं। उनका काम छात्र को यह सिखाना है कि जानकारी का सही उपयोग कैसे करें और मानवीय संवेदनाओं व रचनात्मकता को कैसे जीवित रखें, जो AI नहीं कर सकता।
  • अभिभावक अपने बच्चे को एक ‘ग्लोबल सिटीजन’ बनाने में कैसे मदद कर सकते हैं? बच्चों पर अंकों या एक्स्ट्रा क्लासेस का दबाव न डालें। उन्हें घर पर सुरक्षित संवाद का माहौल दें, उनकी छोटी-छोटी रचनात्मक कोशिशों की सराहना करें और उन्हें अपनी कल्पनाओं को पंख देने की आज़ादी दें।

आधिकारिक संदर्भ (Official References)

  • विषय: सूचनात्मक और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए पॉडकास्ट श्रृंखला।
  • स्रोत: सीबीएसई आधिकारिक अपडेट और ‘CBSE HQ’ पॉडकास्ट।
  • वेबसाइट (URL): https://www.cbse.gov.in
  • अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में व्यक्त किए गए विचार वक्ता (डॉ. अविनाशा शर्मा) के हैं और अनिवार्य रूप से शिक्षा मंत्रालय या सीबीएसई के आधिकारिक रुख का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। नवीनतम नियमों और सर्कुलर के लिए कृपया आधिकारिक सीबीएसई पोर्टल देखें।

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