1.0 परिचय: देवी-पूजा और बेटी-तिरस्कार का विरोधाभास
यह एक अजीब विरोधाभास है, है न? एक ऐसा देश जो देवियों की पूजा करता है, शक्ति का आह्वान करता है, और फिर भी उसी देश में एक बेटी के जन्म पर अक्सर सन्नाटा पसर जाता है। हम 21वीं सदी के भारतीय होने पर गर्व करते हैं, लेकिन आज भी बेटे के जन्म पर जश्न में बजने वाली थालियां और ढोल, बेटी के जन्म पर खामोश हो जाते हैं। यह हमारे समाज का वह दोहरा चरित्र है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।
यह लेख नारों और पोस्टरों से आगे बढ़कर भारत में लैंगिक असमानता की जड़ों तक जाने का एक प्रयास है। हम आंकड़ों और तथ्यों की मदद से इस जटिल मुद्दे की परतें खोलेंगे। हम समझेंगे कि लैंगिक समानता, निष्पक्षता और सशक्तिकरण का असल मतलब क्या है। हम वैश्विक सूचकांकों और घरेलू आंकड़ों के आईने में भारत की वर्तमान स्थिति का विश्लेषण करेंगे। हम उन गहरी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक वजहों को खंगालेंगे जो इस असमानता को जिंदा रखे हुए हैं, और अंत में उन कानूनी, सरकारी और सामाजिक समाधानों की पड़ताल करेंगे जो एक बेहतर और बराबरी वाले भविष्य का रास्ता बना सकते हैं। यह विषय केवल महिलाओं का नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रीय विकास का एक अनिवार्य हिस्सा है, क्योंकि कोई भी समाज अपने आधे हिस्से को पीछे छोड़कर कभी आगे नहीं बढ़ सकता।
2.0 लैंगिक समानता की बुनियाद: समानता, निष्पक्षता और सशक्तिकरण को समझना
लैंगिक समानता पर किसी भी चर्चा से पहले, इन तीन बुनियादी अवधारणाओं को समझना आवश्यक है। ये शब्द अक्सर एक-दूसरे के स्थान पर उपयोग किए जाते हैं, लेकिन इनके अर्थ में महत्वपूर्ण अंतर है।
2.1 लैंगिक समानता (Gender Equality): इसका सीधा सा मतलब है कि सभी लिंगों के व्यक्तियों को समान अधिकार, समान अवसर और समान जिम्मेदारियाँ मिलें। कानून और समाज की नजर में किसी भी व्यक्ति के साथ उसके लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए, “समान कार्य के लिए समान वेतन” का सिद्धांत लैंगिक समानता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
2.2 लैंगिक निष्पक्षता (Gender Equity): यह समानता तक पहुंचने की प्रक्रिया है। लैंगिक निष्पक्षता स्वीकार करती है कि ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से, महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अधिक बाधाओं का सामना करना पड़ा है। इसलिए, बराबरी का स्तर हासिल करने के लिए उन्हें अतिरिक्त सहायता या विशेष प्रावधानों की आवश्यकता हो सकती है। यह सबके लिए एक ही शुरुआती रेखा बनाने जैसा है। उदाहरण के लिए, संसद में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करना लैंगिक निष्पक्षता का एक कदम है ताकि वे निर्णय लेने की प्रक्रिया में बराबरी से भाग ले सकें।
2.3 महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment): यह वह साधन है जिसके द्वारा महिलाएं अपने जीवन पर शक्ति और नियंत्रण हासिल करती हैं। इसमें उन्हें अपने लिए रणनीतिक निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करना शामिल है। यह उन्हें आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से अपनी पूरी क्षमता का एहसास कराने में सक्षम बनाता है। उदाहरण के लिए, महिलाओं को लक्षित कर बनाए गए वित्तीय समावेशन कार्यक्रम, जैसे स्टैंड-अप इंडिया, उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाकर सशक्त करते हैं।
2.4 अंतर को समझना: संक्षेप में, इन तीनों के बीच का संबंध इस प्रकार है:
- समानता (Equality) वह परिणाम है जिसे हम हासिल करना चाहते हैं।
- निष्पक्षता (Equity) वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से समानता तक पहुंचा जाता है।
- सशक्तिकरण (Empowerment) वह साधन है जो महिलाओं को स्वायत्तता और नियंत्रण प्रदान करता है।
3.0 आंकड़ों का आईना: भारत में लैंगिक असमानता की वर्तमान स्थिति
बातें और दावे अपनी जगह हैं, लेकिन आंकड़े एक ऐसी तस्वीर पेश करते हैं जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। भारत में लैंगिक असमानता की हकीकत को समझने के लिए, आइए कुछ महत्वपूर्ण आंकड़ों पर नजर डालते हैं, जो वैश्विक मंच पर हमारी स्थिति और देश के भीतर की तस्वीर दोनों को उजागर करते हैं।
3.1 वैश्विक मंच पर भारत की रैंकिंग: विभिन्न अंतरराष्ट्रीय सूचकांक यह मापने का प्रयास करते हैं कि कोई देश लैंगिक समानता की दिशा में कितना आगे बढ़ा है। इन सूचकांकों में भारत की स्थिति उतार-चढ़ाव भरी रही है।
| सूचकांक (Index) | वर्ष (Year) | भारत की रैंक/स्कोर (India’s Rank/Score) |
| Global Gender Gap Report (World Economic Forum) | 2020 | 112वीं रैंक |
| Global Gender Gap Report (World Economic Forum) | 2022 | 135वीं रैंक |
| Global Gender Gap Report (World Economic Forum) | 2023 | 127वीं रैंक (146 में से) |
| लैंगिक असमानता सूचकांक (GII) – UNDP | 2021 | 122वीं रैंक, स्कोर: 0.490 |
| लैंगिक असमानता सूचकांक (GII) – UNDP | 2022 | 108वीं रैंक (193 में से), स्कोर: 0.437 |
आंकड़े बताते हैं कि यूएनडीपी के लैंगिक असमानता सूचकांक (GII) 2022 में भारत की रैंकिंग में 14 स्थानों का उल्लेखनीय सुधार हुआ है। यह एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह भी सच है कि 193 देशों में 108वें स्थान पर होना यह दर्शाता है कि हमें अभी एक लंबा सफर तय करना है।
3.2 देश के भीतर की तस्वीर: जब हम देश के भीतर शिक्षा, रोजगार और आर्थिक भागीदारी जैसे प्रमुख संकेतकों को देखते हैं, तो पुरुषों और महिलाओं के बीच एक गहरी खाई नजर आती है।
| संकेतक (Indicator) | पुरुष (Male) | महिला (Female) |
| साक्षरता दर (Literacy Rate – 2021 NSO) | 84.70% | 70.30% |
| श्रम बल भागीदारी दर (Labor Force Participation Rate) | 55% | 22% |
| संसद में प्रतिनिधित्व (Representation in Parliament) | 86% | 14% |
| श्रम आय में हिस्सा (Share in Labor Income – World Inequality Report 2022) | 82% | 18% |
| जीडीपी में योगदान (Contribution to GDP) | 83% | 17% |
यह तालिका केवल एक अंतर नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ी बाधाओं की एक श्रृंखला को दर्शाती है। साक्षरता दर में 14% से अधिक का अंतर सीधे तौर पर श्रम बल में महिलाओं की मात्र 22% की चिंताजनक भागीदारी को प्रभावित करता है। जब महिलाएँ कार्यबल से बाहर रहती हैं, तो यह स्वाभाविक रूप से श्रम आय में उनकी हिस्सेदारी को केवल 18% तक सीमित कर देता है, जिसका अंतिम परिणाम राष्ट्रीय जीडीपी में उनके मात्र 17% के योगदान के रूप में सामने आता है। यह एक दुष्चक्र है जहां शैक्षिक अवसर की कमी आर्थिक भागीदारी को रोकती है।
4.0 गहरी जड़ें: भारत में लैंगिक असमानता के मूल कारण
भारत में लैंगिक असमानता कोई सतही समस्या नहीं है; इसकी जड़ें हमारे समाज की संरचना, मान्यताओं और सदियों पुरानी प्रथाओं में गहराई तक जमी हुई हैं। इन मूल कारणों को समझे बिना, हम इसका स्थायी समाधान नहीं खोज सकते।
4.1 पितृसत्तात्मक व्यवस्था (The Patriarchal System): यह लैंगिक असमानता का सबसे प्रमुख और मूल कारण है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री सिल्विया वाल्बे के शब्दों में, पितृसत्ता “सामाजिक संरचना और प्रथाओं की एक ऐसी प्रणाली है जिसमें पुरुष महिलाओं पर हावी होते हैं, उनका दमन करते हैं और उनका शोषण करते हैं।” यह मानसिकता हमारे समाज में इतनी रची-बसी है कि महिलाओं को पुरुषों के अधीन माना जाता है। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश या तीन तलाक जैसे मुद्दों पर होने वाले सामाजिक मतभेद इसी पितृसत्तात्मक सोच का प्रतिबिंब हैं।
4.2 सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताएँ (Social and Cultural Norms): सदियों से चली आ रही कई सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताएँ इस असमानता को पोषित करती हैं।
- पुत्र मोह: बेटे को वंश चलाने वाला (वंश वृद्धि) और बुढ़ापे का सहारा माना जाता है, जबकि बेटियों को “पराया धन” समझा जाता है।
- पुरुष का संरक्षण: प्राचीन भारतीय कानून निर्माता मनु के अनुसार, एक स्त्री को बचपन में पिता के, युवावस्था में पति के और वृद्धावस्था में पुत्र के संरक्षण में रहना चाहिए और वह कभी भी स्वतंत्रता के योग्य नहीं है। यह सोच आज भी कई परिवारों में महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करती है।
4.3 आर्थिक और संरचनात्मक बाधाएँ (Economic and Structural Barriers):
- दहेज प्रथा: दहेज प्रथा जैसी कुप्रथा बेटियों को एक बोझ के रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे उनके जन्म से ही भेदभाव शुरू हो जाता है।
- संपत्ति का असमान वितरण: हालांकि कानून महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबर का अधिकार देता है, लेकिन सामाजिक चलन में उन्हें अक्सर उनके हिस्से से वंचित कर दिया जाता है। आंकड़े बताते हैं कि केवल 9% भूमि पर ही महिलाओं का नियंत्रण है।
5.0 असमानता के कई चेहरे: जीवन के हर क्षेत्र में भेदभाव
लैंगिक असमानता केवल कुछ आंकड़ों या सामाजिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है। यह एक महिला के जीवन के हर पहलू में, जन्म से लेकर मृत्यु तक, अलग-अलग रूपों में प्रकट होती है। नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन द्वारा वर्गीकृत असमानता के प्रकारों को आधार बनाकर हम इसे बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
5.1 जन्म से लेकर जीवन तक (From Birth to Life): 5.1.1 प्रासूतिक और मृत्यु-दर में असमानता (Natality and Mortality Inequality): यह भेदभाव गर्भ से ही शुरू हो जाता है, जिसे नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ‘प्रासूतिक असमानता (Natality Inequality)’ कहते हैं। “पुत्र मोह” के कारण कन्या भ्रूण हत्या आज भी एक कड़वी सच्चाई है। इसके साथ ही, भारत दुनिया के उन चुनिंदा बड़े देशों में से है जहाँ ‘मृत्यु-दर में असमानता (Mortality Inequality)’ के कारण लड़कों की तुलना में बच्चियों की मृत्यु दर अधिक है, जबकि वैश्विक स्तर पर लड़कियां जन्म के समय अधिक मजबूत होती हैं।
5.2 शिक्षा का अधिकार, एक अधूरा ख्वाब (The Right to Education, An Unfulfilled Dream): 5.2.1 अवसरों में असमानता (Inequality in Opportunity): यह अमर्त्य सेन द्वारा वर्णित ‘विशेष अवसर सम्बन्धी असमानता’ का एक स्पष्ट उदाहरण है। साक्षरता के आंकड़ों में 14.4% का अंतर इस असमानता को साफ दर्शाता है। लड़कियों की शिक्षा को आज भी एक “बुरा निवेश” माना जाता है क्योंकि उन्हें शादी के बाद दूसरे घर जाना होता है। इसी कारण, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, लड़कियों की स्कूल छोड़ने की दर लड़कों से कहीं अधिक है।
5.3 आर्थिक क्षेत्र: अदृश्य श्रम और अनकहा शोषण (The Economic Sphere: Invisible Labor and Unspoken Exploitation): 5.3.1 व्यावसायिक और स्वामित्व असमानता (Professional and Ownership Inequality): अमर्त्य सेन इसे ‘व्यावसायिक असमानता’ और ‘स्वामित्व असमानता’ के रूप में परिभाषित करते हैं। भारत में महिला श्रम बल की भागीदारी दर बहुत कम है। जो महिलाएं काम करती भी हैं, उन्हें अक्सर लैंगिक वेतन अंतराल (Gender Pay Gap) का सामना करना पड़ता है। इससे भी बड़ी त्रासदी यह है कि महिलाओं द्वारा किए जाने वाले आधे से अधिक काम (जैसे घरेलू काम और बच्चों की देखभाल) अवैतनिक होते हैं, जिसे देश की जीडीपी में गिना ही नहीं जाता। महिलाएं 40% कृषि कार्य करती हैं, लेकिन केवल 9% भूमि पर उनका स्वामित्व है।
5.4 राजनीति में महिलाओं की भागीदारी (Women’s Participation in Politics): 5.4.1 शक्ति के गलियारों में सीमित पहुँच (Limited Access to Power): भारतीय संसद में केवल 14% सीटें महिलाओं के पास हैं, जिससे हम वैश्विक स्तर पर 122वें स्थान पर हैं। हालांकि, पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण के कारण स्थानीय स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहतर है, जो यह साबित करता है कि अवसर मिलने पर महिलाएं नेतृत्व कर सकती हैं।
5.5 समाज और परिवार के भीतर (Within Society and Family): 5.5.1 घरेलू और लैंगिक हिंसा (Domestic and Gender-based Violence): यह ‘घरेलू असमानता (Household Inequality)’ का सबसे भयावह रूप है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि भारत में लगभग एक-तिहाई महिलाओं ने अपने जीवन में कभी न कभी शारीरिक या यौन हिंसा का सामना किया है। 5.5.2 बाल विवाह की कुप्रथा (The Evil of Child Marriage): यूनेस्को के अनुसार, दुनिया की हर तीन बाल वधुओं में से एक भारतीय है। हालांकि, भारत ने इस क्षेत्र में प्रगति की है और बाल विवाह की दर 47% से घटकर 23.3% हो गई है, लेकिन बिहार, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और झारखंड जैसे राज्यों में यह आज भी राष्ट्रीय औसत से अधिक है।
5.6 मनोरंजन और खेल जगत (Entertainment and Sports): यह असमानता ग्लैमर की दुनिया में भी मौजूद है। अभिनेत्रियों को अक्सर अभिनेताओं की तुलना में बहुत कम भुगतान किया जाता है। इसी तरह, खेल जगत में भी महिला और पुरुष खिलाड़ियों की पुरस्कार राशि में भारी अंतर देखा जाता है।
6.0 बदलाव की राह: समानता की ओर बढ़ते कदम
चुनौतियां गंभीर हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कोई प्रगति नहीं हुई है। भारत ने लैंगिक समानता की दिशा में संवैधानिक, कानूनी और नीतिगत स्तर पर कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जो एक उम्मीद की किरण जगाते हैं।
6.1 कानूनी और संवैधानिक सुरक्षा कवच (Legal and Constitutional Safeguards): भारतीय संविधान समानता का मूल अधिकार देता है।
- अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करता है।
- अनुच्छेद 15 लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव पर रोक लगाता है। इन संवैधानिक गारंटियों को मजबूती देने के लिए कई कानून बनाए गए हैं, जैसे:
- दहेज निषेध अधिनियम (1961)
- घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम (2005)
- कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम (2013)
- हाल ही में पारित संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023, जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान करता है, एक ऐतिहासिक कदम है।
6.2 सरकारी पहल और योजनाएँ: एक नई दिशा: सरकारों ने महिलाओं को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। ये योजनाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक स्वतंत्रता और सुरक्षा जैसे विभिन्न पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करती हैं।
| योजना का नाम (Scheme Name) | मुख्य उद्देश्य (Primary Objective) |
| बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ | बालिकाओं के अस्तित्व, सुरक्षा और शिक्षा को सुनिश्चित करना। |
| सुकन्या समृद्धि योजना | बालिकाओं के भविष्य के लिए वित्तीय सुरक्षा प्रदान करना। |
| प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना | गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को मातृत्व लाभ देना। |
| वन स्टॉप सेंटर योजना | हिंसा से पीड़ित महिलाओं को एकीकृत सहायता और समर्थन प्रदान करना। |
| महिला शक्ति केंद्र | ग्रामीण महिलाओं को कौशल विकास और रोजगार के अवसर प्रदान करना। |
| स्टैंड-अप इंडिया | महिला उद्यमियों को वित्तीय सहायता देकर प्रोत्साहित करना। |
| जेंडर बजटिंग | यह सुनिश्चित करना कि विकास योजनाओं का लाभ महिलाओं तक पहुंचे। |
6.3 शिक्षा और जागरूकता की शक्ति (The Power of Education and Awareness): कानून और योजनाएं तभी सफल हो सकती हैं जब समाज की सोच में परिवर्तन आए। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, “किसी भी देश की उन्नति का पता उस देश की महिलाओं की उन्नति से लगाया जा सकता है।” वास्तविक बदलाव के लिए स्कूलों में लिंग-संवेदनशील पाठ्यक्रम को अपनाना और घरों में रूढ़िवादी धारणाओं को चुनौती देना आवश्यक है।
6.4 अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ (International Commitments): भारत ने लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए वैश्विक मंचों पर भी अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है। इसमें संयुक्त राष्ट्र का सतत विकास लक्ष्य 5 (SDG 5), जो लैंगिक समानता हासिल करने पर केंद्रित है, और बीजिंग डिक्लेरेशन एंड प्लेटफॉर्म फॉर एक्शन जैसी पहलें शामिल हैं।
7.0 निष्कर्ष: एक लंबा सफर, एक साझा जिम्मेदारी
आंकड़े, कानून और सामाजिक विश्लेषण एक स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं: भारत लैंगिक समानता की राह पर आगे तो बढ़ा है, लेकिन मंजिल अभी बहुत दूर है। जीआईआई रैंकिंग में सुधार और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं में कमी निश्चित रूप से उत्साहजनक हैं, लेकिन शिक्षा, आर्थिक भागीदारी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में गहरी खाई, और समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक सोच यह याद दिलाती है कि चुनौतियां अभी भी विकराल हैं।
लैंगिक समानता केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं है; यह एक मानवीय, सामाजिक और आर्थिक मुद्दा है। यह पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। एक ऐसा भारत बनाना जहां हर बेटी को जन्म लेने, शिक्षित होने, काम करने और अपने सपनों को पूरा करने का समान अवसर मिले, न केवल एक नैतिक अनिवार्यता है, बल्कि देश की आर्थिक और सामाजिक समृद्धि के लिए भी आवश्यक है। अब सवाल यह है कि इस बदलाव में आप और हम क्या भूमिका निभा सकते हैं?
8.0 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: लैंगिक समानता (Gender Equality) और लैंगिक निष्पक्षता (Gender Equity) में क्या अंतर है? उत्तर: लैंगिक समानता का अर्थ है सभी को समान अवसर और अधिकार देना (परिणाम)। वहीं, लैंगिक निष्पक्षता इस बात को स्वीकार करती है कि ऐतिहासिक नुकसान के कारण कुछ समूहों (जैसे महिलाओं) को बराबरी पर लाने के लिए अतिरिक्त या विशेष सहायता की आवश्यकता हो सकती है (प्रक्रिया)। निष्पक्षता, समानता तक पहुंचने का एक रास्ता है।
प्रश्न 2: GII और ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट में क्या अंतर है? भारत की रैंकिंग दोनों में अलग क्यों है? उत्तर: दोनों सूचकांक लैंगिक असमानता को मापते हैं, लेकिन उनके मानदंड अलग हैं। ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट (WEF) चार आयामों पर केंद्रित है: आर्थिक भागीदारी, शैक्षिक प्राप्ति, स्वास्थ्य और राजनीतिक सशक्तिकरण। वहीं, लैंगिक असमानता सूचकांक (GII – UNDP) तीन आयामों का उपयोग करता है: प्रजनन स्वास्थ्य, सशक्तिकरण (राजनीतिक और शैक्षिक) और श्रम बाजार भागीदारी। अलग-अलग मानदंडों के कारण एक ही देश की रैंकिंग दोनों रिपोर्टों में भिन्न हो सकती है।
प्रश्न 3: क्या भारत में महिलाओं को संपत्ति में समान अधिकार देने के लिए कोई कानून है? उत्तर: हाँ, कानूनी तौर पर, हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 जैसे कानून बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर अधिकार देते हैं। हालांकि, सामाजिक दबाव और जागरूकता की कमी के कारण, व्यवहार में अक्सर महिलाओं को इस अधिकार से वंचित कर दिया जाता है।
प्रश्न 4: “पितृसत्ता” का वास्तव में क्या मतलब है और यह लैंगिक असमानता को कैसे बढ़ावा देती है? उत्तर: पितृसत्ता एक सामाजिक व्यवस्था है जिसमें पुरुषों को प्राथमिक शक्ति और अधिकार प्राप्त होता है, और वे समाज के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में प्रभुत्व रखते हैं। यह व्यवस्था यह मानकर चलती है कि पुरुष स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ हैं, जिसके कारण महिलाओं को दोयम दर्जे का माना जाता है, उनके अवसरों को सीमित किया जाता है और उनके खिलाफ भेदभाव और हिंसा को सामान्य बना दिया जाता है।
प्रश्न 5: लैंगिक समानता को बढ़ावा देने में पुरुषों की क्या भूमिका हो सकती है? उत्तर: पुरुषों की भूमिका महत्वपूर्ण है। वे रूढ़िवादी धारणाओं को चुनौती दे सकते हैं, घरेलू कामों और बच्चों की देखभाल में बराबर की जिम्मेदारी निभा सकते हैं, कार्यस्थल पर महिला सहकर्मियों के लिए एक सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल बना सकते हैं, और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं। लैंगिक समानता एक साझा लक्ष्य है जिसे पुरुषों और महिलाओं को मिलकर ही हासिल करना होगा।
