1. इंट्रोडक्शन: अर्जुन की कहानी और आज का कड़वा सच 🎓
पुणे के एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज से चार साल की मेहनत, लाखों का एजुकेशन लोन और रातों-रात की गई कोडिंग प्रैक्टिस—23 वर्षीय अर्जुन मेहता के पास वह सब कुछ था जो एक ‘सफल’ भारतीय छात्र के पास होना चाहिए। लेकिन दीक्षांत समारोह (Convocation) के एक साल बाद, अर्जुन आज वाराणसी में अपने घर की बालकनी में बैठा है। हाथ में डिग्री का फोल्डर है, लेकिन ईमेल इनबॉक्स में केवल ‘Regret to inform you’ वाले रिजेक्शन लेटर्स। वह बेरोजगार है और एक बार फिर उन सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में जुटा है, जिनसे बचने के लिए उसने कभी इंजीनियरिंग चुनी थी।
अर्जुन की कहानी आज के भारत के लाखों ‘शिक्षित बेरोजगारों’ का चेहरा है। भारत में हर साल लगभग 30-40 लाख स्नातक (Graduates) जॉब मार्केट में कदम रखते हैं, लेकिन कड़वा सच यह है कि उनमें से आधे भी नौकरी के लायक नहीं समझे जाते। इसे हम ‘एम्प्लॉयबिलिटी क्राइसिस’ (Employability Crisis) कहते हैं। अक्सर छात्र यह सोचते हैं कि डिग्री का कागज उन्हें सीधे कॉर्पोरेट की सीढ़ी चढ़ा देगा, पर हकीकत में यह केवल एक ‘एंट्री पास’ है।
यह लेख केवल डरावने आंकड़ों का पुलिंदा नहीं है। एक सीनियर स्ट्रेटेजिस्ट के तौर पर, मैं आपको उस “अदृश्य अंतर” के बारे में बताऊंगा जो टियर-1 (IITs, IIMs, BITS) और टियर-3 कॉलेज के छात्रों के बीच होता है। हम समझेंगे कि कोडिंग में तो फासला कम हो रहा है, लेकिन नॉन-टेक नौकरियों में टियर-1 के छात्र आज भी ‘बॉस लेवल’ पर क्यों खेल रहे हैं। क्या आपकी डिग्री आपका भविष्य तय करेगी, या आपकी वह स्किल जिसे आपने खुद सीखा है? चलिए, इस ‘फ्रैगमेंटेड रियलिटी’ (Fragmented Reality) का पोस्टमार्टम करते हैं।
2. रियलिटी चेक: क्या भारत में डिग्री सिर्फ एक कागज का टुकड़ा है? 📊
भारत में शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई अब एक बड़ी दरार बन चुकी है। इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2025 और Mercer | Mettl के ताज़ा आंकड़े एक विरोधाभासी तस्वीर पेश करते हैं। जहाँ एक ओर सकारात्मक माहौल है कि पिछले एक दशक में रोजगार योग्यता (Employability) में 20% का उछाल आया है, वहीं दूसरी ओर ताज़ा ‘ग्राउंड जीरो’ रिपोर्ट बताती है कि क्वालिटी में गिरावट आई है।
नीचे दी गई तालिका आज की वास्तविक स्थिति को दर्शाती है:
तालिका 1: भारत में स्नातक रोजगार योग्यता (Graduate Employability) का स्नैपशॉट
| इंडिकेटर (Indicator) | डेटा / प्रतिशत (%) | स्रोत (Source) |
| कुल रोजगार योग्यता (Overall Employability) | 54.8% (10 साल में 20-पॉइंट ग्रोथ) | इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2025 |
| संशोधित रोजगार योग्यता (Adjusted Estimate) | 42.6% (पिछले साल से गिरावट) | Mercer |
| युवा बेरोजगारी (Youth Unemployment – Age 20-24) | 44.5% | CMIE डेटा |
| टियर-1 कॉलेज रोजगार योग्यता | 48.4% | Mercer |
| टियर-2 कॉलेज रोजगार योग्यता | 46.1% | Mercer |
| टियर-3 कॉलेज रोजगार योग्यता | 43.4% | Mercer |
विश्लेषण: ये आंकड़े डरावने क्यों हैं? इसे समझिए—20-24 साल के लगभग 44.5% युवा डिग्री होने के बावजूद बेरोजगार हैं। Mercer | Mettl के अनुसार, पिछले साल (44.3%) के मुकाबले इस साल रोजगार योग्यता में गिरावट आई है। यह एक “फ्रैगमेंटेड रियलिटी” है—एक तरफ रिपोर्ट कहती है कि हम बेहतर हो रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ कंपनियां कह रही हैं कि उन्हें सही टैलेंट नहीं मिल रहा। सच तो यह है कि डिग्री ले ली, पर दिमाग वही पुराने रट्टा-मार सिलेबस में अटका है। मार्केट जिस बुलेट ट्रेन की रफ़्तार से बदल रहा है, हमारे कॉलेज आज भी पैसेंजर ट्रेन की स्पीड पर चल रहे हैं।
3. टियर-1 vs टियर-3: यह अंतर कोई खाई नहीं, बल्कि एक ‘दूरी’ है 🛣️
अक्सर लोग सोचते हैं कि टियर-1 और टियर-3 कॉलेजों के बीच का अंतर केवल ‘ब्रांड नेम’ या ‘लक्जरी कैंपस’ का है। लेकिन डेटा बताता है कि टियर-1 (48.4%) और टियर-3 (43.4%) के बीच 5% का यह अंतर आंकड़ों से कहीं अधिक गहरा है। यह कोई खाई नहीं है जिसे फांदा न जा सके, बल्कि एक ऐसी ‘दूरी’ है जिसे तय करने के लिए टियर-3 के छात्रों को दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है।
इसे समझने के लिए हमें ‘इनविजिबल करिकुलम’ (Invisible Curriculum) यानी अदृश्य पाठ्यक्रम को समझना होगा।
एक दिन टियर-1 छात्र का बनाम टियर-3 छात्र का:
- टियर-1 छात्र: सुबह से ही वह ऐसे इकोसिस्टम में है जहाँ हर असाइनमेंट में प्रेजेंटेशन देना अनिवार्य है। उसे अपनी बात मनवाने के लिए ‘तर्क’ (Logic) देना पड़ता है। कैंपस में स्टार्टअप कल्चर है, जहाँ फेल होना भी एक सीख है। वह लगातार ‘हाई-प्रेशर’ सिचुएशन में रहता है जहाँ हर हफ्ते डेडलाइन होती है।
- टियर-3 छात्र: यहाँ आज भी ‘अटेंडेंस’ और ‘नोट्स’ पर जोर है। मूल्यांकन केवल सेमेस्टर परीक्षा के 3 घंटों में होता है। यहाँ छात्र चुपचाप बैठकर लेक्चर सुनता है, लेकिन उसे कभी यह मौका नहीं मिलता कि वह स्टेज पर खड़ा होकर किसी ‘Brief’ को डिफेंड कर सके।
यही वह ‘इनविजिबल करिकुलम’ है जो टियर-1 छात्र को “Workplace Ready” बनाता है। वे बेहतर इसलिए नहीं हैं कि वे स्मार्ट पैदा हुए हैं, बल्कि इसलिए हैं क्योंकि उनके कॉलेज उन्हें हर दिन वह ‘दूरी’ तय करने पर मजबूर करते हैं।
4. टेक्निकल रोल्स में कम होता फासला: कोडिंग ने सबको बराबर कर दिया? 💻
इंजीनियरिंग के छात्रों के लिए एक अच्छी खबर है। टेक्निकल भूमिकाओं (Technical Roles) में कॉलेजों का दबदबा तेजी से कम हो रहा है। Mercer | Mettl के अनुसार, टेक्निकल रोल्स में टियर-1 की रोजगार योग्यता 46.4% है, जबकि टियर-3 की 43.0% है। यह अंतर केवल 3.4% का है!
कोडिंग ने मैदान को बराबर (Level the playing field) क्यों कर दिया? इसका सबसे बड़ा कारण है—‘स्किल डेमोक्रेटाइजेशन’। आज अगर वाराणसी में बैठा अर्जुन Python या React सीखना चाहता है, तो उसे IIT जाने की ज़रूरत नहीं है। YouTube, Coursera, और GitHub पर वही ज्ञान उपलब्ध है जो दुनिया के सबसे बड़े प्रोफेसर पढ़ा रहे हैं। टेक्निकल लर्निंग को ‘डिस्ट्रीब्यूट’ करना आसान हो गया है। आज कोडिंग, टेस्टिंग और फ्रंट-एंड के क्षेत्र में कंपनियाँ ‘डिग्री’ की जगह ‘GitHub Repository’ और ‘Portfolio’ देख रही हैं। अगर आप कोड लिख सकते हैं और समस्या हल कर सकते हैं, तो टियर-3 का टैग आपके करियर की ‘ब्रेक’ नहीं बनेगा।
5. नॉन-टेक जॉब्स का ‘बॉस लेवल’: यहाँ टियर-1 कॉलेज क्यों बाजी मार ले जाते हैं? 🏆
असली ‘हसल’ (Hustle) शुरू होती है नॉन-टेक सेक्टर में—जैसे सेल्स, डिजिटल मार्केटिंग, एचआर और ऑपरेशंस। यहाँ टियर-1 (51.1%) और टियर-3 (44.2%) के बीच का अंतर काफी बढ़ जाता है। नॉन-टेक नौकरियों में केवल विषय का ज्ञान होना काफी नहीं है; यहाँ परीक्षा आपके ‘पर्सनालिटी’ और ‘माइंडसेट’ की होती है।
इसे Mercer | Mettl की रिपोर्ट “Workplace Readability” कहती है।
“नॉन-टेक हायरिंग में अक्सर यह देखा जाता है कि क्या स्नातक एक संक्षिप्त विवरण (Brief) की व्याख्या कर सकता है, अपने तर्कों को संरचना (Structure) दे सकता है, स्पष्ट रूप से लिख सकता है और बिना घबराए अपने निर्णयों का बचाव कर सकता है? क्या वह बिना किसी के हाथ थामे (Hand-holding) काम पूरा कर सकता है?”
टियर-1 के कॉलेजों में ‘पीयर बेंचमार्किंग’ इतनी मजबूत होती है कि छात्र अनजाने में ही ये स्किल्स सीख जाते हैं। जबकि टियर-3 में छात्र ज्ञान (Knowledge) के साथ तो निकलते हैं, लेकिन ‘परफॉरमेंस’ (Performance) में पीछे रह जाते हैं। यह ‘बॉस लेवल’ पार करने के लिए आपको सिर्फ पढ़ना नहीं, बल्कि ‘सीखना’ होगा।
6. डिजिटल मार्केटिंग का पेचीदा मामला: टूल्स तो सब जानते हैं, पर माइंडसेट कहाँ है? 📱
डिजिटल मार्केटिंग को आज के दौर की सबसे सुलभ (Accessible) नौकरी माना जाता है। लेकिन यहाँ का डेटा चौंकाने वाला है: टियर-1 की रोजगार योग्यता 55.1% है, जबकि टियर-3 की केवल 41.8%।
ऐसा क्यों? क्योंकि टियर-3 का छात्र अक्सर यह सोचता है कि “फेसबुक एड्स चलाना” या “इंस्टाग्राम पर रील डालना” ही डिजिटल मार्केटिंग है। लेकिन टियर-1 का छात्र ‘डेटा इंटरप्रिटेशन’ (Data Interpretation) और ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ पर ध्यान देता है। हायरिंग मैनेजर को ऐसे लोग नहीं चाहिए जो सिर्फ बटन दबाना जानते हों, उन्हें ऐसे लोग चाहिए जो यह बता सकें कि “अगर हमारा ROI 2% गिरा है, तो उसका कारण क्या है और हम इसे कैसे ठीक करेंगे?” टियर-1 के छात्र अपने तर्कों को स्पष्टता के साथ रखना जानते हैं और वे ‘वेगनेस’ (Vagueness) या अस्पष्टता का शिकार नहीं होते।
7. सॉफ्ट स्किल्स का ‘डेफिसिट’: जब आपकी इंग्लिश नहीं, आपका ‘कम्युनिकेशन’ आड़े आता है 🗣️
भारतीय छात्रों में एक बड़ी गलतफहमी है कि “अगर मुझे इंग्लिश आती है, तो मेरी सॉफ्ट स्किल्स अच्छी हैं।” यह सरासर गलत है। कंपनियाँ ‘इंग्लिश’ के पीछे नहीं, बल्कि ‘प्रोफेशनल क्लेरिटी’ (Professional Clarity) के पीछे भाग रही हैं। Mercer | Mettl की रिपोर्ट के अनुसार, केवल 50% स्नातक ही कम्युनिकेशन में कुशल हैं।
- क्रिएटिव थिंकिंग (44.3%): केवल इतने ही छात्र किसी समस्या का नया समाधान सोच पाते हैं। ज़्यादातर छात्र आज भी ‘कॉपी-पेस्ट’ मानसिकता में फंसे हैं।
- अडैप्टेबिलिटी: क्या आप बदलते माहौल में खुद को ढाल सकते हैं?
- टीम वर्क: क्या आप दूसरों के साथ मिलकर काम कर सकते हैं, या आप केवल अकेले ‘हसल’ करना जानते हैं?
हमारी शिक्षा प्रणाली रटने (Rote Learning) पर आधारित है, जो छात्रों की सोचने की क्षमता को खत्म कर देती है। कंपनियाँ अब ‘डिग्री’ के बजाय आपकी ‘एडेप्टेबिलिटी’ और ‘लर्निंग एजिलिटी’ (Learning Agility) को देख रही हैं।
8. एआई (AI) का तूफान: खतरा या अवसर? 🤖
एआई (AI) अब भविष्य की बात नहीं, आज की हकीकत है। भारत का एआई मार्केट 2027 तक 17-22 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। अगर आप सोच रहे हैं कि एआई आपकी नौकरी छीन लेगा, तो आप गलत हैं। सच तो यह है कि “एआई आपकी नौकरी नहीं छीनेगा, बल्कि वह व्यक्ति आपकी नौकरी छीन लेगा जो एआई का उपयोग करना जानता है।”
रिपोर्ट के अनुसार, अब 46% स्नातक AI और Machine Learning (ML) में कुशल हो रहे हैं। सरकार ने भी इसे गंभीरता से लिया है। ‘IndiaAI मिशन’ के लिए ₹10,371.92 करोड़ का भारी-भरकम बजट आवंटित किया गया है। इस मिशन का एक बड़ा हिस्सा ‘IndiaAI Future Skills’ प्रोग्राम है, जिसका लक्ष्य टियर-2 और टियर-3 शहरों में एआई लैब स्थापित करना है। भविष्य उन्हीं का है जो एआई को अपना ‘को-पायलट’ बनाएंगे।
9. जेंडर और जियोग्राफी का गणित: दिल्ली बनाम बाकी भारत 📍
रोजगार योग्यता के मामले में भारत एक समान नहीं है। इसमें जेंडर और लोकेशन का बड़ा हाथ है:
- दिल्ली का दबदबा (53.4%): दिल्ली इस लिस्ट में टॉप पर है। इसके पीछे बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और इंडस्ट्री के साथ करीबी संपर्क एक बड़ी वजह है। उत्तराखंड, पंजाब और हिमाचल प्रदेश भी अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं।
- जेंडर गैप: पुरुष स्नातकों की रोजगार योग्यता 43.4% है, जबकि महिलाओं की 41.7%। हालांकि यह अंतर कम है, लेकिन कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए हमें अभी और ‘स्किलिंग’ की ज़रूरत है।
- उभरते राज्य: उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने टॉप 10 में जगह बनाकर यह साबित किया है कि अगर सही दिशा में काम किया जाए, तो टैलेंट कहीं से भी निकल सकता है।
10. क्या कॉलेज ही सब कुछ सिखाएगा? ‘रिहर्सल’ की अहमियत 🔄
इस लेख का सबसे बड़ा टेक-अवे (Take-away) यह शब्द है: ‘रिहर्सल’ (Rehearsal)। टाइम्स ऑफ इंडिया के विश्लेषण के अनुसार, टियर-1 छात्र बेहतर इसलिए होते हैं क्योंकि उनके कॉलेज उन्हें बार-बार ‘रिहर्सल’ करवाते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे एक क्रिकेटर नेट प्रैक्टिस करता है। टियर-1 में प्रेजेंटेशन, ग्रुप डिस्कशन और इंटर्नशिप कोई ‘विकल्प’ नहीं, बल्कि ‘अनिवार्यता’ है।
टियर-3 के छात्रों के लिए मेरी कड़वी सलाह: अगर आपका कॉलेज आपको ‘रिहर्सल’ नहीं करवा रहा, तो खुद अपना ‘थिएटर’ बनाइए। घर पर शीशे के सामने खड़े होकर अपनी स्पीच रिकॉर्ड कीजिए, डिजिटल मार्केटिंग का एक छोटा प्रोजेक्ट खुद चलाइए, और उसे डिफेंड करना सीखिए। जब तक आप ‘परफॉरमेंस’ की प्रैक्टिस नहीं करेंगे, आप केवल ‘ज्ञान’ के साथ बेरोजगार बैठे रहेंगे।
11. सरकारी समाधान: NEP 2020 और स्किल इंडिया की पहल 🇮🇳
सरकार अब समझ चुकी है कि केवल डिग्री बांटने से देश नहीं चलेगा। स्किल-गैप को भरने के लिए कई बड़े कदम उठाए जा रहे हैं:
- NEP 2020: राष्ट्रीय शिक्षा नीति अब ‘वोकेशनल ट्रेनिंग’ और ‘मल्टीडिसिप्लिनरी एजुकेशन’ पर जोर दे रही है। अब कॉलेज में केवल थ्योरी नहीं, बल्कि अनिवार्य इंटर्नशिप होगी।
- PM Internship Scheme (PMIS): वित्त वर्ष 2024-25 के लिए 800 करोड़ रुपये के बजट के साथ, इस योजना का लक्ष्य देश की टॉप 500 कंपनियों में 1.25 लाख युवाओं को इंटर्नशिप दिलाना है। यह सीधे ‘इंडस्ट्री एक्सपोजर’ देने की कोशिश है।
- IndiaAI Future Skills: टियर-2 और टियर-3 शहरों के युवाओं को भविष्य की तकनीक के लिए तैयार करना।
12. अगला कदम: आप खुद को ‘जॉब-रेडी’ कैसे बनाएं? 💡
यदि आप अर्जुन की तरह महसूस कर रहे हैं, तो रुकिए। रोने से नौकरी नहीं मिलेगी, ‘स्किल-अप’ करने से मिलेगी। यहाँ 5 व्यावहारिक टिप्स दिए गए हैं:
- स्किल सर्टिफिकेशन (Beyond Degrees): केवल यूनिवर्सिटी की डिग्री पर भरोसा न करें। डेटा एनालिटिक्स, क्लाउड कंप्यूटिंग या एआई में ऑनलाइन सर्टिफिकेशन लें। यह आपकी क्रेडिबिलिटी (Credibility) बढ़ाता है।
- रिहर्सल (Simulate Performance): खुद को रिकॉर्ड करें। एक डिजिटल मार्केटिंग ब्रीफ लें और उस पर 5 मिनट की प्रेजेंटेशन दें। उसे दोबारा देखें और सुधारें।
- नेटवर्किंग (Hustle Culture): LinkedIn पर केवल जॉब न ढूंढें, ‘रिलेशनशिप’ बनाएं। अपनी इंडस्ट्री के लोगों से जुड़ें और उनसे फीडबैक मांगें।
- इंटर्नशिप को ‘पायनियर’ बनाएं: 93% छात्र इंटर्नशिप चाहते हैं, लेकिन केवल कुछ ही इसमें ‘काम’ सीखते हैं। छोटी कंपनी में इंटर्नशिप करें, वहाँ आपको सीखने को ज़्यादा मिलेगा।
- एआई का स्मार्ट इस्तेमाल: ChatGPT या अन्य टूल्स का उपयोग केवल होमवर्क के लिए नहीं, बल्कि अपनी उत्पादकता (Productivity) बढ़ाने के लिए करें।
13. इंडस्ट्री-अकादमिक पार्टनरशिप: समय की मांग 🤝
कंपनियाँ अब ‘डिग्री’ के बजाय ‘कॉम्पिटेंसी’ (Competency) ढूंढ रही हैं। आईटी सेक्टर में ‘वॉल्यूम हायरिंग’ कम हो रही है, जिसका मतलब है कि कंपनियाँ अब और भी ज़्यादा ‘पिकी’ (Pickey) हो गई हैं। कॉलेजों को अब कंपनियों के साथ मिलकर पाठ्यक्रम बनाना होगा। जब तक कॉलेज के प्रोफेसर और कॉर्पोरेट मैनेजर एक ही मेज पर नहीं बैठेंगे, तब तक अर्जुन जैसे छात्र बेरोजगार रहेंगे। अब समय ‘सर्टिफिकेट’ का नहीं, ‘रिजल्ट’ का है।
14. निष्कर्ष: क्या आप रेस के लिए तैयार हैं? 🏁
आज के इस दौर में, टियर-1 का टैग आपको पहली सीढ़ी तक पहुँचा सकता है, लेकिन बाकी की सीढ़ियाँ आपको अपनी ‘स्किल’ और ‘परफॉरमेंस’ के दम पर ही चढ़नी होंगी। अर्जुन अब वाराणसी में हार मानकर नहीं बैठा है। उसने हाल ही में एआई फंडामेंटल्स का एक ऑनलाइन कोर्स शुरू किया है और LinkedIn पर सक्रिय है। उसे समझ आ गया है कि उसकी पुणे वाली डिग्री ने उसे जो नहीं सिखाया, वह उसे अब खुद सीखना होगा।
यह रेस लंबी है, लेकिन मैदान अब सबके लिए खुला है। कोडिंग ने फासला कम किया है, और एआई नए अवसर ला रहा है। टियर-3 के छात्र अब ‘विजेता’ बन सकते हैं, बशर्ते वे ‘रिहर्सल’ करने के लिए तैयार हों।
जाते-जाते खुद से एक कड़वा सवाल पूछें: “क्या आपकी अगली नौकरी आपकी डिग्री की वजह से लगेगी या उस स्किल की वजह से जो आपने खुद सीखी है?”
15. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)❓
Q1: क्या टियर-3 कॉलेज का छात्र IIT के छात्र को मात दे सकता है? उत्तर: बिल्कुल! टेक्निकल रोल्स में फासला बहुत कम (43% vs 46.4%) है। अगर आपके पास बेहतरीन प्रोजेक्ट्स और एआई स्किल्स हैं, तो टियर-3 का छात्र टियर-1 को आसानी से पीछे छोड़ सकता है।
Q2: नॉन-टेक जॉब्स में टियर-1 का इतना दबदबा क्यों है? उत्तर: क्योंकि नॉन-टेक रोल्स में ‘सॉफ्ट स्किल्स’ और ‘प्रेजेंटेशन’ की अहमियत ज़्यादा होती है, जो टियर-1 के इकोसिस्टम में छात्रों को स्वाभाविक रूप से सिखाई जाती हैं। इसे ‘Workplace Readability’ कहते हैं।
Q3: क्या एआई आने से फ्रेशर्स के लिए नौकरियां खत्म हो जाएंगी? उत्तर: नौकरियां खत्म नहीं होंगी, बल्कि बदल जाएंगी। जो छात्र एआई टूल्स का इस्तेमाल जानते हैं, उनके लिए 4-5 गुना ज़्यादा सैलरी वाले अवसर खुल रहे हैं।
Q4: पीएम इंटर्नशिप स्कीम का फायदा कैसे लें? उत्तर: आप इसके आधिकारिक पोर्टल (pminternship.mca.gov.in) पर रजिस्टर कर सकते हैं। यह टॉप 500 कंपनियों में वास्तविक काम सीखने का सुनहरा मौका है।
Q5: सॉफ्ट स्किल्स सुधारने का सबसे आसान तरीका क्या है? उत्तर: ‘रिहर्सल’। कॉलेज के इवेंट्स में हिस्सा लें, डिबेट करें, और अपनी राइटिंग स्किल्स पर काम करें। अपनी बातचीत में स्पष्टता (Clarity) लाएं।
16. महत्वपूर्ण लिंक और संदर्भ (Official Sources)🔗
- National Education Policy 2020: [https://www.education.gov.in/sites/upload_files/mhrd/files/NEP_Final_English_0.pdf] (Subject: National Education Policy 2020)
- Prime Minister’s Internship Scheme: [https://pminternship.mca.gov.in/] (Subject: Prime Minister’s Internship Scheme in Top Companies)
- IndiaAI Mission: [https://indiaai.gov.in/indiaai-mission] (Subject: Making AI in India and Making AI Work for India, Dated: 2024-25)
Written by CBSERanker Team
Educational content creators focused on CBSE Computer Science,
Python, and exam preparation.
