CBSE का नया धमाका: क्या है यह R1, R2, R3 लैंग्वेज रूल? बोर्ड एग्ज़ाम से पहले यह पढ़ना है ज़रूरी! 🚨

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बोर्ड एग्ज़ाम और भाषाओं का नया चक्कर: एक शुरुआत

क्या आप भी उन लाखों छात्रों और माता-पिता में से हैं जो आज बोर्ड की नई ‘शब्दावली’ सुनकर थोड़े घबराए हुए हैं? “बेटा, R1 कौन सी ली है? R3 के लिए टीचर कहाँ मिलेगा?” अगर ये सवाल आपके घर के डिनर टेबल पर भी गूँज रहे हैं, तो आप अकेले नहीं हैं। देशभर के स्कूलों, कोचिंग सेंटर्स और पेरेंट्स ग्रुप्स में इस समय सबसे बड़ा ‘बज़’ सीबीएसई के नए लैंग्वेज फॉर्मूले को लेकर है। ऐसा लग रहा है जैसे बोर्ड ने रातों-रात आपकी मार्कशीट का पूरा नक्शा ही बदलने की तैयारी कर ली है।

यह कोई छोटा-मोटा बदलाव नहीं है जिसे आप एक नोटिफिकेशन मानकर नजरअंदाज कर दें। यह एक ऐसा ‘गेम-चेंजर’ है जो आपकी माध्यमिक शिक्षा (Secondary Education) की जड़ों को हिलाने वाला है। अगर आप सोच रहे थे कि बस इंग्लिश और हिंदी के सहारे नैया पार हो जाएगी, तो अब समय आ गया है ‘वेक-अप कॉल’ का। सीबीएसई ने नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) 2020 और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (NCFSE) 2023 के विज़न को लागू करते हुए भाषाओं को एक नया ढांचा दिया है। यह बदलाव आपके पढ़ने के तरीके, आपकी बोर्ड एग्ज़ाम की पात्रता (Eligibility) और यहाँ तक कि आपके भविष्य के करियर विकल्पों को भी प्रभावित करेगा। चलिए, इस भाषाई पहेली को एक-एक करके सुलझाते हैं और समझते हैं कि इसके पीछे का असली ‘मास्टर प्लान’ क्या है।

आखिर यह R1, R2, R3 क्या बला है? सीधे शब्दों में समझें

याद है वो पुराना दौर जब हम ‘फर्स्ट लैंग्वेज’, ‘सेकंड लैंग्वेज’ और ‘थर्ड लैंग्वेज’ की बात करते थे? अक्सर तीसरी भाषा को हम एक ‘एडिशनल बोझ’ समझते थे जिसे कक्षा 8 के बाद एक पुराने जैकेट की तरह उतार कर फेंक दिया जाता था। लेकिन अब कहानी पूरी तरह बदल गई है। सीबीएसई के इस नए अवतार में ‘R’ का मतलब है ‘Rule’ या ‘Requirement’। यह अब केवल एक ‘ऑप्शन’ नहीं है, बल्कि एक अनिवार्य ‘नियम’ है।

नो-नॉनसेन्स अंदाज़ में कहें तो सीबीएसई ने भाषाओं को तीन अलग-अलग स्तरों या लेवल्स में बांट दिया है। अब आप यह नहीं कह सकते कि “मुझे बस दो भाषाएं पढ़नी हैं।” अब ‘थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला’ आपकी बोर्ड परीक्षा का गेटकीपर बन गया है। सरल शब्दों में, R1, R2 और R3 तीन अलग-अलग भाषाएं हैं जिन्हें आपको एक निश्चित व्यवस्था के तहत चुनना होगा। यहाँ सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब भाषाओं का चयन आपकी पसंद से ज़्यादा बोर्ड के ‘इंडियन लैंग्वेज’ वाले विज़न से तय होगा। बोर्ड का साफ़ कहना है कि अब भाषा सिर्फ एक विषय नहीं है जिसे आप रटकर पास कर लें, बल्कि यह एक ऐसी ‘रिक्वायरमेंट’ है जिसके बिना आपकी क्लास 10 की मार्कशीट पूरी नहीं मानी जाएगी।

R1: आपकी अपनी भाषा, आपका अपना स्वैग

R1 यानी आपकी ‘प्राथमिक भाषा’ (Primary Language)। बोर्ड इसे ‘एडवांस लेवल’ की श्रेणी में रख रहा है। सीबीएसई का विज़न बहुत साफ़ है: वह चाहते हैं कि बच्चा उस भाषा में महारत हासिल करे जो उसके दिल के सबसे करीब है—उसकी मातृभाषा (Mother Tongue) या क्षेत्रीय भाषा (Regional Language)।

सीबीएसई के रणनीतिकारों का मानना है कि प्री-प्राइमरी और प्राइमरी लेवल पर बच्चे अक्सर ‘लैंग्वेज बैरियर’ का शिकार होते हैं। स्कूल में इंग्लिश का भारी-भरकम बोझ और घर पर बोली जाने वाली अपनी भाषा के बीच तालमेल बिठाने में बच्चे का ‘लर्निंग ग्राफ’ नीचे गिर जाता है। R1 को प्राथमिकता देकर बोर्ड इस भाषाई बाधा को तोड़ना चाहता है। लक्ष्य यह है कि 2031 तक, जब आज का छठी कक्षा का छात्र दसवीं की बोर्ड परीक्षा दे, तो उसकी R1 भाषा उसकी मातृभाषा हो। इसे सिर्फ़ बातचीत की भाषा नहीं, बल्कि एक उच्च शैक्षणिक स्तर (Advanced Level) पर पढ़ाया जाएगा। इससे न केवल छात्रों की सीखने की क्षमता बढ़ेगी, बल्कि वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों और साहित्य से भी गहराई से जुड़ पाएंगे। यह आपकी अपनी भाषा है, और अब इसे पढ़ना आपके स्वैग का हिस्सा होगा।

R2 और R3 का गणित: इंग्लिश के साथ क्या होगा?

अब उस सवाल पर आते हैं जो हर सीबीएसई छात्र और पेरेंट की रातों की नींद उड़ा रहा है— “क्या इंग्लिश को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है?” जवाब है: बिल्कुल नहीं। पर हाँ, इंग्लिश का रोल अब थोड़ा बदल जाएगा।

यहाँ ‘गणित’ बहुत दिलचस्प है। R2 (द्वितीय भाषा) और R3 (तृतीय भाषा) का चुनाव करते समय आपको एक सख्त नियम का पालन करना होगा। नियम यह है कि आपके द्वारा चुनी गई तीन भाषाओं (R1, R2, R3) में से कम से कम दो भाषाएँ भारतीय (Native Indian Languages) होनी अनिवार्य हैं।

ज़्यादातर सीबीएसई स्कूल इंग्लिश को R2 के तौर पर ऑफर करेंगे क्योंकि यह एक ग्लोबल एकेडमिक लैंग्वेज है। साइंस, टेक और सोशल स्टडीज के लिए इंग्लिश की ज़रूरत को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन अगर आप इंग्लिश को R2 के रूप में चुनते हैं, तो नियम के मुताबिक आपकी R1 और R3 दोनों अनिवार्य रूप से भारतीय भाषाएं ही होनी चाहिए। आप विदेशी भाषा (जैसे फ्रेंच, जर्मन या स्पेनिश) पढ़ना चाहते हैं? आप पढ़ सकते हैं, लेकिन उसे केवल R3 के तौर पर तभी लिया जा सकता है जब आपकी R1 और R2 दोनों भारतीय भाषाएं हों। इसका मतलब यह है कि अगर आप इंग्लिश और कोई विदेशी भाषा दोनों पढ़ना चाहते हैं, तो अब यह संभव नहीं होगा क्योंकि आपको कम से कम दो भारतीय भाषाएं पढ़ना अनिवार्य है। यह नियम सीबीएसई के उस विज़न को दर्शाता है जहाँ वह भारतीय भाषाओं को वैश्विक भाषाओं के बराबर खड़ा करना चाहता है।

भाषा चयन का मास्टर चार्ट (Quick Guide Table)

अक्सर पेरेंट्स इस बात को लेकर उलझन में रहते हैं कि कौन सी भाषा किसके साथ ‘फिट’ बैठेगी। आपकी इस मुश्किल को आसान बनाने के लिए नीचे दिए गए चार्ट और उदाहरणों को ध्यान से देखें:

लेवलविवरणचयन की शर्त
R1प्राथमिक भाषा (Advanced Level)कोई भी भारतीय भाषा या मातृभाषा
R2द्वितीय भाषाR1 से अलग होनी चाहिए (जैसे इंग्लिश या कोई भारतीय भाषा)
R3तृतीय भाषाR1 और R2 दोनों से अलग होनी चाहिए (भारतीय या विदेशी भाषा)

समझिए क्या सही है और क्या गलत (Logic Scenarios):

  • Scenario A: R1 (हिंदी), R2 (इंग्लिश), R3 (तमिल) -> Valid. (दो भारतीय भाषाएं मौजूद हैं)।
  • Scenario B: R1 (मराठी), R2 (हिंदी), R3 (इंग्लिश) -> Valid. (दो भारतीय भाषाएं मौजूद हैं)।
  • Scenario C: R1 (हिंदी), R2 (इंग्लिश), R3 (फ्रेंच) -> Invalid. (यहाँ केवल एक ही भारतीय भाषा ‘हिंदी’ है। R3 में विदेशी भाषा तभी ले सकते हैं जब R2 भी कोई भारतीय भाषा हो)।
  • Scenario D: R1 (इंग्लिश), R2 (स्पेनिश), R3 (हिंदी) -> Invalid. (यहाँ भी केवल एक ही भारतीय भाषा है)।

विशेष नोट: आप एक ही भाषा को दो अलग-अलग लेवल पर नहीं पढ़ सकते। अगर आपने R1 में हिंदी ली है, तो R2 में ‘बेसिक हिंदी’ लेकर आप बच नहीं सकते। आपको पूरी तरह से अलग भाषा चुननी होगी।

डेडलाइन अलर्ट: यह नियम कब से हो रहा है लागू?

सीबीएसई इस बदलाव को किसी ‘सर्प्राइज टेस्ट’ की तरह नहीं ला रहा है, बल्कि इसे बहुत ही चरणबद्ध (Phased Implementation) तरीके से लागू किया जा रहा है। बोर्ड जानता है कि इतने बड़े सिस्टम को रातों-रात बदलना नामुमकिन है।

सबसे पहली महत्वपूर्ण तारीख है सत्र 2026-27। इस साल से कक्षा 6 के छात्रों के लिए तीसरी भाषा (R3) का अध्ययन करना पूरी तरह अनिवार्य हो जाएगा। इसके बाद, यह नियम हर साल एक कदम आगे बढ़ेगा। 2029-30 तक यह नियम कक्षा 9 तक पहुँच जाएगा। और अंत में, 2031 की बोर्ड परीक्षा वह ऐतिहासिक वर्ष होगा जब सीबीएसई के दसवीं के छात्र पहली बार इस नए R1, R2, R3 फॉर्मेट और ‘तीनों भाषाओं में पास’ होने के नियम के साथ अपना फाइनल एग्जाम देंगे। इसका सीधा मतलब यह है कि जो बच्चे अभी कक्षा 3, 4 या 5 में हैं, उनके लिए यह नया सिस्टम ही उनका ‘नॉर्मल’ होगा। उन्हें अभी से एक से अधिक भारतीय भाषाओं के प्रति अपना लगाव बढ़ाना शुरू कर देना चाहिए।

Wait, What? बोर्ड एग्ज़ाम के लिए नई पात्रता: एक भी भाषा में फेल, तो सब फेल!

यहाँ कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट आता है। इसे बहुत ध्यान से पढ़िए क्योंकि यह आपकी बोर्ड एलिजिबिलिटी से जुड़ा है। अब तक हम तीसरी भाषा को सिर्फ़ कक्षा 8 तक का एक औपचारिकता (Formality) मानते थे। लेकिन नए नियम के अनुसार, कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा में बैठने के लिए तीनों भाषाओं (R1, R2, R3) में पास होना अनिवार्य होगा।

सीबीएसई ने साफ़ कर दिया है कि कोई भी छात्र तब तक बोर्ड परीक्षा के लिए पात्र (Eligible) नहीं माना जाएगा, जब तक उसने तीनों भाषाओं की परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण न कर ली हो।

अभी के छात्रों के लिए ‘रेड अलर्ट’: अगर आप सोच रहे हैं कि यह नियम तो 2031 में आएगा, तो आप गलती कर रहे हैं। सोर्स कॉन्टेक्स्ट (NDTV रिपोर्ट) के अनुसार, जो छात्र वर्तमान में कक्षा 7 या उससे ऊपर हैं, उनके लिए भी नियम कड़े हैं। इन छात्रों के लिए यह अनिवार्य है कि उन्होंने कक्षा 8 तक तीनों भाषाओं का अध्ययन किया हो और उनमें पास हुए हों। यदि कोई छात्र कक्षा 8 में तीसरी भाषा में फेल हो जाता है या उसे छोड़ देता है, तो उसे कक्षा 10 के बोर्ड एग्जाम के लिए रजिस्ट्रेशन करने में भारी दिक्कत आ सकती है। यह अब कोई ‘लाइट’ विषय नहीं है; यह आपकी मार्कशीट का एक अभिन्न हिस्सा है। एक भी भाषा में फेल होने का मतलब है बोर्ड एग्जाम की रेस से बाहर हो जाना।

NEP 2020 और NCFSE 2023: इसके पीछे की असली ‘Game Plan’

एक सीनियर स्ट्रैटेजिस्ट के तौर पर मैं आपको बता सकता हूँ कि यह बदलाव कोई ‘रैंडम’ फैसला नहीं है। यह भारत के एजुकेशन सिस्टम को ‘डिकोलोनाइज़’ (Decolonize) करने और छात्रों को भविष्य के लिए तैयार करने का एक बड़ा ‘गेम प्लान’ है। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) 2020 का मूल मंत्र ही ‘बहुभाषीवाद’ (Multilingualism) है।

सरकार और बोर्ड आखिर क्या हासिल करना चाहते हैं?

सबसे पहला कारण है कॉग्निटिव डेवलपमेंट (Cognitive Development)। न्यूरोसाइंस की कई रिसर्च कहती हैं कि जो बच्चे बचपन से दो या तीन भाषाएं सीखते हैं, उनका दिमाग ज़्यादा लचीला (Flexible) होता है। उनकी प्रॉब्लम-सॉल्विंग स्किल्स और मल्टी-टास्किंग क्षमता आम बच्चों से बेहतर होती है।

दूसरा बड़ा कारण है सांस्कृतिक एकीकरण (Cultural Integration)। सरकार चाहती है कि उत्तर भारतीय छात्र तमिल या कन्नड़ सीखें, और दक्षिण भारतीय छात्र हिंदी या बंगाली। इससे ‘लैंग्वेज बैरियर’ टूटेगा और राष्ट्रीय अखंडता को मज़बूती मिलेगी। यह सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि एक भारतीय को दूसरे भारतीय से उसकी अपनी भाषा में जोड़ने की कोशिश है। सीबीएसई का यह कदम उसे इंटरनेशनल बोर्ड्स (जैसे IB या IGCSE) के मुकाबले खड़ा करता है, जहाँ भाषाओं के चुनाव और उनके ‘एप्लीकेशन’ पर बहुत ज़ोर दिया जाता है। बोर्ड चाहता है कि सीबीएसई के छात्र ‘ग्लोबल’ होने के साथ-साथ अपनी जड़ों में भी उतने ही गहरे हों।

The Real Tea: क्या स्कूल तैयार हैं? ग्राउंड रियलिटी और चुनौतियां

चलिए अब ‘पॉलिटिकली करेक्ट’ बातों से हटकर असली हकीकत यानी ‘The Real Tea’ पर आते हैं। कागज़ पर यह नीति जितनी क्रांतिकारी और खूबसूरत लगती है, ज़मीन पर इसे लागू करना किसी हिमालय चढ़ने जैसा है। सबसे बड़ी चुनौती है— टीचर्स की भारी कमी।

अभिभावक निकिता जैन की चिंता इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है। वह चाहती हैं कि उनकी बेटी कोई दक्षिण भारतीय भाषा सीखे, लेकिन उनके पास कोई विकल्प नहीं है क्योंकि स्कूल में संस्कृत के अलावा किसी और तीसरी भाषा का टीचर ही नहीं है। उत्तर भारत के ज़्यादातर निजी और सरकारी स्कूलों में ‘थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला’ का मतलब सिर्फ़ ‘हिंदी+इंग्लिश+संस्कृत’ बनकर रह गया है।

क्या स्कूलों के पास तमिल, तेलुगु, मराठी या मलयालम पढ़ाने के लिए रिसोर्सेज हैं? क्या वे उन टीचर्स को सैलरी दे पाएंगे? स्कूलों के लिए यह एक प्रशासनिक सिरदर्द (Administrative Nightmare) बनने वाला है। स्कूलों को अब सिर्फ़ इंफ्रास्ट्रक्चर ही नहीं, बल्कि एक ‘मल्टीलिंग्वल फैकल्टी’ भी तैयार करनी होगी। अगर ऐसा नहीं होता, तो यह बेहतरीन नीति सिर्फ़ कागज़ों तक सीमित रह जाएगी और छात्र मजबूरी में वही पुरानी भाषाएं पढ़ते रहेंगे जो उपलब्ध हैं।

सिलेबस और किताबों का क्या होगा?

किताबों को लेकर छात्रों और पेरेंट्स के मन में मचे हाहाकार को बोर्ड ने भांप लिया है। सीबीएसई ने असेसमेंट और सिलेबस के बीच के बारीक अंतर को स्पष्ट किया है:

  • किताबों का सस्पेंस: फिलहाल के लिए R1 और R2 के लिए एक ही एनसीईआरटी (NCERT) किताबों का उपयोग किया जाएगा। लेकिन यहाँ एक पेंच है—किताबें भले ही एक हों, पर R1 के छात्र के लिए परीक्षा का स्तर (Assessment) कठिन और एडवांस होगा, जबकि R2 के छात्र के लिए वही किताब थोड़े सरल स्तर पर परखी जाएगी।
  • क्षेत्रीय भाषाओं का जुगाड़: जब तक एनसीईआरटी हर क्षेत्रीय भाषा के लिए अपनी किताबें तैयार नहीं कर लेती, तब तक स्कूलों को संबंधित राज्य बोर्डों (State Boards) द्वारा निर्धारित किताबों का उपयोग करने की छूट दी गई है।
  • भविष्य का प्लान: एनसीईआरटी धीरे-धीरे R1, R2 और R3 के लिए लेवल-विशिष्ट (Level-specific) किताबें विकसित कर रहा है ताकि हर स्तर की अपनी एक अलग पहचान हो।

छात्रों पर बढ़ता बोझ या भविष्य की तैयारी?

एक मानवीय दृष्टिकोण से देखें तो एक औसत छात्र के लिए तीन भाषाएं पढ़ना किसी ‘बौद्धिक बोझ’ से कम नहीं लगता। पहले से ही भारी-भरकम साइंस और मैथ्स के सिलेबस के बीच तीसरी भाषा में पास होना बच्चों को तनाव दे सकता है। लेकिन अगर हम इसे एक बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यह बोझ नहीं, बल्कि एक ‘लाइफ स्किल’ है।

बहुभाषी होना आपको दुनिया के किसी भी कोने में दूसरों से आगे रखता है। यह आपकी क्रिटिकल थिंकिंग को बढ़ाता है। ज़रूरत इस बात की है कि स्कूल इसे एक उबाऊ विषय के रूप में पढ़ाने के बजाय एक ‘अनुभव’ के रूप में पेश करें। भाषा को नंबरों के तराजू में तौलने के बजाय इसे संवाद के एक पुल के रूप में देखा जाना चाहिए। सहानुभूतिपूर्ण लेकिन तार्किक तरीके से सोचें तो आज की यह मेहनत भविष्य में किसी भी छात्र के लिए करियर के नए दरवाज़े खोल सकती है—चाहे वह अनुवाद (Translation) का क्षेत्र हो, कूटनीति (Diplomacy) हो या ग्लोबल बिज़नेस।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs) जो हर स्टूडेंट के मन में हैं

यहाँ कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो मुझे हर वेबिनार और सेमिनार में पूछे जाते हैं, और इनके जवाब सोर्स कॉन्टेक्स्ट के आधार पर बिलकुल स्पष्ट हैं:

क्या मैं स्पेनिश या फ्रेंच पढ़ सकता हूँ? हाँ, बिल्कुल! लेकिन इसकी एक शर्त है। इसे आप R3 के तौर पर तभी ले सकते हैं जब आपकी R1 और R2 भाषाएं अनिवार्य रूप से ‘भारतीय’ हों। यानी आप ‘इंग्लिश + फ्रेंच + हिंदी’ का कॉम्बिनेशन नहीं बना सकते। आपको ‘हिंदी + संस्कृत/तमिल + फ्रेंच’ जैसा कुछ चुनना होगा।

क्या यह नियम अभी के कक्षा 9 के छात्रों पर लागू है? कक्षा 9 के मौजूदा छात्रों के लिए यह नया R1, R2, R3 स्ट्रक्चर अभी अनिवार्य नहीं हुआ है, लेकिन उन्हें कक्षा 8 तक तीन भाषाएं पढ़कर पास करना ज़रूरी था। चरणबद्ध कार्यान्वयन के अनुसार, 2026-27 से कक्षा 6 के लिए यह पूर्णतः अनिवार्य हो जाएगा।

क्या तीनों भाषाओं के मार्क्स बोर्ड रिज़ल्ट में जुड़ेंगे? फिलहाल बोर्ड ने ‘पास’ होने को अनिवार्य बनाया है। अंकों की वेटेज और बोर्ड रिज़ल्ट में उनकी गणना आने वाले असेसमेंट रिफॉर्म्स और बोर्ड की अंतिम गाइडलाइन्स से तय होगी।

क्या प्राइवेट और सरकारी दोनों स्कूलों के लिए यह नियम है? हाँ, सीबीएसई से संबद्ध (Affiliated) हर स्कूल को चाहे वह सरकारी हो, प्राइवेट हो या केंद्रीय विद्यालय, इस त्रिभाषा सूत्र का पालन करना ही होगा।

अगर मेरा स्कूल सिर्फ संस्कृत का विकल्प दे तो क्या करें? यह एक बड़ी समस्या है। आप स्कूल मैनेजमेंट से बात कर सकते हैं या क्लस्टर लेवल पर उपलब्ध अन्य भाषाओं की मांग कर सकते हैं। बोर्ड भी स्कूलों को अधिक भाषा विकल्प प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

आखिरी विचार: भाषा सिर्फ विषय नहीं, एक अनुभव है

सीबीएसई का यह नया R1, R2, R3 नियम भारत को एक बहुभाषी समाज बनाने की दिशा में उठाया गया एक साहसी और रणनीतिक कदम है। यह नियम केवल परीक्षाओं को पास करने के बारे में नहीं है, बल्कि यह हमारी भाषाई विविधता को गले लगाने के बारे में है। क्या हम वाकई इस बदलाव के लिए तैयार हैं? क्या हमारे स्कूल बच्चों को किसी नई भारतीय भाषा को उसी उत्साह के साथ सिखा पाएंगे जैसे वे इंग्लिश सिखाते हैं?

यह तो समय ही बताएगा, लेकिन छात्रों के लिए यह अपनी जड़ों को समझने और देश की विविधता को महसूस करने का एक सुनहरा मौका है। भाषा एक खिड़की है, और सीबीएसई ने अब आपके लिए तीन खिड़कियां खोल दी हैं। चुनाव आपका है कि आप उनसे कैसी दुनिया देखना चाहते हैं।

आधिकारिक जानकारी और महत्वपूर्ण लिंक

इस पूरी योजना की बारीकियों को समझने के लिए आप सीबीएसई के आधिकारिक दस्तावेज़ों का संदर्भ ले सकते हैं। किसी भी भ्रम की स्थिति में केवल आधिकारिक वेबसाइट पर ही भरोसा करें।

  • Circular Subject: Implementation of Multilingual Education and Three-Language Formula in alignment with NCFSE 2023.
  • Circular Number/Source: CBSE Secondary School Curriculum Alignment with NCFSE 2023 and NEP 2020.
  • Date/Reference: As per Official Notification dated April 03, 2026.
  • Authority: Central Board of Secondary Education (CBSE).
  • Official Link: https://www.cbse.gov.in

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